देहरा तिजारा। श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र देहरा तिजारा में चल रहे 31वें मंगल चातुर्मास के अंतर्गत चंद्र तीर्थ मंडपम् में आयोजित धर्मसभा में भावलिंगी संत आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी महामुनिराज ने संसार की वास्तविकता बताते हुए कहा कि दुनिया एक मेला है।इस मेले में सभी जीव एक-दूसरे से मिलते रहते हैं, लेकिन संसार में मिलने वाला प्रत्येक व्यक्ति हमारा सच्चा साथी नहीं होता। भगवान सर्वज्ञ देव ने संसार की वास्तविकता को समझाते हुए बताया है कि इस संसार में जो भी जीव एक-दूसरे से मिलते हैं, वे अपने-अपने कर्मों के कर्ज से बंधे हुए हैं।मंदिर अध्यक्ष मुकेश जैन और प्रचार मंत्री उमंग जैन ने बताया की आचार्य श्री ने कहा कि संसार में ऐसा कोई जीव नहीं है जो कर्जदार न हो। प्रत्येक जीव अपने कर्मों का कर्ज लेकर आया है और उसे उतारने के लिए संसार में भटक रहा है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि जीव कर्ज उतारने के बजाय उसे लगातार बढ़ाता चला जाता है।उन्होंने कहा कि राग भी कर्ज है, मोह भी कर्ज है और द्वेष भी कर्ज है। अज्ञानता के कारण जीव को लगता है कि जितना राग बढ़ रहा है, उतना ही सुख और शांति प्राप्त हो रही है, जबकि वास्तविकता यह है कि राग-द्वेष और मोह के कारण कर्मों का बंधन निरंतर बढ़ता जाता है।आचार्य श्री ने कहा कि तीर्थंकर जैसे महापुरुषों ने इसी कर्म-कर्ज से मुक्त होने के लिए मोक्ष का मार्ग अपनाया। उन्होंने राग, द्वेष और मोह का त्याग कर आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचाना और संसार से मुक्ति का मार्ग दिखाया।उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि संसार में रहिए, लेकिन संसार को अपने भीतर मत बसाइए। सांसारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए राग-द्वेष और मोह को कम करना ही आत्मकल्याण की दिशा में पहला कदम है।इस अवसर पर मंदिर अध्यक्ष मुकेश जैन, महामंत्री नरेंद्र जैन, कोषाध्यक्ष शिंभू जैन, प्रचार मंत्री उमंग जैन, चातुर्मास अध्यक्ष सुरेश जैन (पटेल), नीरज जैन, विजय जैन, अंशुल जैन, सोनू जैन, वरुण जैन एवं रवि जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
संसार के मेले में हर जीव कर्जदार, राग-द्वेष और मोह बढ़ा रहे कर्मों का कर्ज — आचार्य विमर्श सागर जी

