ग्वालियर। जब संगीत केवल कला न रहकर साधना बन जाता है, तब सुरों में श्रद्धा की सुगंध और समर्पण की आभा स्वतः उतर आती है। ऐसा ही अलौकिक वातावरण सिद्धपीठ श्री गंगादास जी की बड़ी शाला में आयोजित रागायन के वार्षिक स्वरांजलि समारोह में साकार हुआ, जहाँ ग्वालियर घराने के प्रख्यात गायनाचार्य पंडित सीतारामशरण जी महाराज की पुण्यस्मृति तथा 1857 के स्वतंत्रता समर के हुतात्मा संतों को स्वरांजलि अर्पित की गई। संगीत, अध्यात्म और गुरु-भक्ति का यह अद्भुत संगम कलाकारों और श्रोताओं दोनों के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव बन गया।
गुरु-स्मरण से हुआ समारोह का शुभारंभ:
समारोह का शुभारंभ राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय की कुलगुरु प्रो. स्मिता सहस्त्रबुद्धे, सिद्धपीठ के पीठाधीश्वर एवं रागायन के अध्यक्ष महंत स्वामी रामसेवक दास जी महाराज तथा संस्कार भारती के महानगर महामंत्री चंद्रप्रताप सिंह सिकरवार द्वारा माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलन एवं गुरु-पूजन के साथ हुआ। आचार्य मंगलदास चौबे के वैदिक स्वस्तिवाचन ने वातावरण को आध्यात्मिक गरिमा से आलोकित कर दिया। सभागार में उपस्थित संगीत-रसिकों ने अनुभव किया कि यह केवल एक सांगीतिक आयोजन नहीं, बल्कि परंपरा, श्रद्धा और साधना का उत्सव है।
साधना और समर्पण को मिला सम्मान:
समारोह गुरु-परंपरा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी बना। वरिष्ठ संगीत साधक एवं गायक पंडित महेशदत्त पाण्डेय को ‘पंडित सीतारामशरण सम्मान’ से अलंकृत किया गया। अतिथियों ने उन्हें शॉल, श्रीफल और प्रशस्ति-पत्र भेंट कर सम्मानित किया। यह सम्मान वस्तुतः उस तपस्या और साधना का अभिनंदन था जिसने दशकों तक ग्वालियर की सांगीतिक परंपरा को जीवंत और समृद्ध बनाए रखा है।
श्रद्धा के स्वरों में गूँजी गुरु-वंदना:
कार्यक्रम का आरंभ पंडित महेशदत्त पाण्डेय द्वारा रचित प्रशस्ति-गान “जय गुरुदेव नमन, पंडित सीताराम शरण…” से हुआ। विशेष बात यह रही कि जिस संगीत साधक को समारोह में सम्मानित किया जा रहा था, उसी की रचना से गुरु-वंदना का शुभारंभ हुआ। संजय देवले, हेमांग कोल्हटकर और सुजल जैन ने इसे अत्यंत श्रद्धा और भाव-संपन्नता के साथ प्रस्तुत किया। तबले पर अविनाश महाजनी तथा हारमोनियम पर अनूप मोघे की संगति ने प्रस्तुति को और अधिक प्रभावशाली बना दिया। पूरे सभागार में भक्ति और कृतज्ञता का भाव तरंगित हो उठा।
विचित्र वीणा पर साकार हुआ नाद-ब्रह्म:
इसके पश्चात मंच पर विराजित हुईं देश की अग्रणी विचित्र वीणा वादिका पद्मजा विश्वरूप। उन्होंने राग भूप में आलाप, जोड़ और झाला के माध्यम से राग के स्वरूप को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उभारा। चौताल और सूलताल की गतों ने ध्रुपद-अंग की गंभीरता तथा राग की आत्मिक गरिमा को उजागर किया।
उनका वादन सुनते हुए ऐसा प्रतीत होता था मानो वीणा के तारों से नहीं, स्वयं नाद-ब्रह्म से स्वर फूट रहे हों। राग के गंभीर और शांत भावों को उन्होंने इतनी सूक्ष्मता से अभिव्यक्त किया कि समय की गति मानो थम-सी गई। श्रोता एक ऐसे सुरलोक में पहुँच गए जहाँ केवल संगीत था और संगीत का आत्मिक अनुभव। पद्मजा विश्वरूप के वादन की सबसे बड़ी विशेषता उनकी स्वर-साधना की विलक्षण सूक्ष्मता है। विचित्र वीणा में पर्दों का अभाव कलाकार से असाधारण स्वर-नियंत्रण की अपेक्षा करता है। ऐसे में स्वर की शुद्धता और उसके सूक्ष्म अंतरालों की अभिव्यक्ति अत्यंत कठिन हो जाती है। किंतु पद्मजा के हाथों में यह कठिनाई सहज सौंदर्य में रूपांतरित हो जाती है।
उनके मींड इतने तरल और निर्बाध थे कि स्वर एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक नहीं जाते, बल्कि प्रकाश की रेखा की तरह फैलते चले जाते थे। तानों में गति थी, किंतु उतावलापन नहीं; विस्तार था, किंतु प्रदर्शन का आग्रह नहीं। उनकी प्रस्तुति में तकनीकी कौशल की चमक से अधिक रागभाव की आंतरिक दीप्ति दिखाई दी।
परंपरा के संरक्षण का मौन यज्ञ:
पद्मजा विश्वरूप का महत्व केवल एक कुशल वादिका होने तक सीमित नहीं है। वे विचित्र वीणा जैसी विलुप्तप्राय होती जा रही परंपरा की महत्वपूर्ण संवाहिका हैं। अपनी प्रस्तुतियों, शिक्षण और युवा कलाकारों के साथ निरंतर संवाद के माध्यम से वे इस दुर्लभ वाद्य को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का कार्य कर रही हैं।
उनका वादन सुनते हुए बार-बार यह अनुभूति होती है कि भारतीय संगीत की कोई प्राचीन ध्वनि-परंपरा पुनः अपना स्वर पा रही है। यह प्रस्तुति केवल संगीत नहीं थी, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति के संरक्षण का एक मौन यज्ञ थी।
जयतीर्थ मेवुंडी के स्वरों ने बाँधा समां:
समारोह का एक अन्य प्रमुख आकर्षण मुंबई से पधारे ख्यातनाम गायक पंडित जयतीर्थ मेवुंडी का गायन रहा। उन्होंने अपने विशिष्ट गायन कौशल और गहन रागदृष्टि का परिचय देते हुए राग पूरिया कल्याण की विलंबित एवं द्रुत बंदिशों को अत्यंत परिपक्वता और सौंदर्यबोध के साथ प्रस्तुत किया। एकताल में निबद्ध विलंबित बंदिश – आज सोबना और तीनताल की द्रुत बंदिश – बहुत दिन बीते को उन्होंने बड़े ही सलीके से गाया। राग-विस्तार में उनके स्वर एक-एक करके ऐसे विकसित होते गए मानो किसी पुष्प की पंखुड़ियाँ धीरे-धीरे खुल रही हों। आलाप की गंभीरता, बोल-आलाप की अर्थवत्ता और तानों की स्वाभाविक उड़ान ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनके गायन में साधना की गहराई और भावों की सहज अभिव्यक्ति का अद्भुत संतुलन दिखाई दिया।
तबले पर मधुसूदन कोप्प, हारमोनियम पर अक्षत मिश्रा तथा वायलिन पर सुभाष देशपांडे की संगति ने प्रस्तुति को और अधिक प्रभावशाली बना दिया। संगतकारों ने अत्यंत संवेदनशीलता और सजगता के साथ मुख्य कलाकार के भावों को विस्तार प्रदान किया।
संगीत बना आत्मा का उत्सव
पूरे आयोजन में कलाकारों की साधना, गुरुजनों के प्रति सम्मान और श्रोताओं की तन्मय सहभागिता ने ऐसा वातावरण निर्मित किया जिसमें संगीत मनोरंजन की सीमाओं का अतिक्रमण कर साधना का रूप धारण करता दिखाई दिया। मंच पर प्रस्तुत प्रत्येक स्वर श्रद्धा का प्रतीक था और प्रत्येक प्रस्तुति गुरु-परंपरा के प्रति कृतज्ञता का भाव व्यक्त कर रही थी।
अमर विरासत को भावपूर्ण नमन
रागायन द्वारा आयोजित यह स्वरांजलि समारोह भारतीय शास्त्रीय संगीत की उस अमर परंपरा का सजीव उत्सव था, जिसकी जड़ें गुरु-शिष्य संबंधों की पावन भूमि में गहराई तक पैठी हुई हैं। पंडित सीतारामशरण जैसे गुरुजन भले ही आज देह रूप में हमारे बीच उपस्थित न हों, किंतु उनके संस्कार, उनकी साधना और उनके सुर आज भी अपने शिष्यों के कंठों तथा भारतीय संगीत की चेतना में जीवित हैं।
यह आयोजन एक बार फिर स्मरण कराता है कि संगीत केवल श्रवण का विषय नहीं, बल्कि आत्मा को परिष्कृत करने वाली साधना है। रागायन की यह स्वरांजलि उसी शाश्वत सांगीतिक विरासत को समर्पित एक भावपूर्ण प्रणाम थी।

