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जन्माष्टमी पर द्वारकाधीश मंदिर और सिद्धपीठ श्री गंगादास की बड़ी शाला में भजन संध्या, शास्त्रीयता, भक्ति और लोकभाव का सुंदर संगम

ग्वालियर। जन्माष्टमी के अवसर पर ग्वालियर में आयोजित भक्ति संगीत कार्यक्रमों ने पर्व की आध्यात्मिकता को संगीत की भावपूर्ण अभिव्यक्ति से जोड़ दिया। द्वारकाधीश मंदिर, मुरार में संस्कृति विभाग के श्रीकृष्ण पाथेय न्यास द्वारा ‘घर-घर गोकुल, घर-घर गोपाल’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। वहीं रानी लक्ष्मीबाई कॉलोनी स्थित बाबा गंगादास की बड़ी शाला में भी भक्ति संगीत संध्या हुई। दोनों आयोजनों में कृष्ण भक्ति के विविध रंग दिखाई दिए।
द्वारकाधीश मंदिर में कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि हॉकी इंडिया के अध्यक्ष देवेंद्र प्रताप सिंह तोमर ने किया। इस अवसर पर वरिष्ठ गायक पंडित उमेश कंपुवाले का स्वागत किया गया। पंडित कंपुवाले ने ‘चलो मन वृंदावन की ओर’, ‘राणा जी मैं तो गोविंद के गुण गाऊं’, ‘दरस बिन दुखन लागे नैन’ और ‘जय मीरा के गिरधर’ सहित अनेक भजनों की प्रस्तुति दी। उनकी गायकी में भक्ति के साथ शास्त्रीय संगीत की गहराई भी अनुभव हुई।
पंडित कंपुवाले के साथ उनके शिष्यों अजय प्रताप सिंह, हमीर कंपुवाले, रुचि सासोदे, रुचि पराड़कर, सोनिया अग्रवाल और अरुणगीता द्विवेदी ने गायन में संगति की। तबले पर डॉ. मनीष करवड़े, हारमोनियम पर अक्षत मिश्रा तथा कीबोर्ड पर हर्ष भाटिया और कपिल शर्मा ने संगत दी। मंच संचालन अनिकेत तारलेकर ने किया।
दूसरी ओर सिद्धपीठ श्री गंगादास जी की बड़ी शाला मुख्य अतिथि मछुआ कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष सीताराम बाथम एवं सिद्धपीठ श्री गंगादास जी की बड़ी शाला के महंत पीठाधीश्वर रामसेवक दास जी महाराज के सानिध्य में आयोजित संगीत संध्या में युवा गायक पीयूष तांबे ने श्रीकृष्ण के भजनों को अपनी भावपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया। ‘बाजे मुरलिया’, ‘वो काला एक बाँसुरीवाला’, ‘ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन’, ‘राधा ऐसी भई शाम की दीवानी’ और ‘जैसे बड़ी तेर भई नंदलाला’ जैसे भजनों ने वातावरण को कृष्णमय बना दिया। कीबोर्ड पर मुनेन्द्र परिहार और तबले पर पुनीत द्विवेदी ने प्रभावी संगत की।

इन आयोजनों की विशेषता केवल भजनों की प्रस्तुति नहीं रही, बल्कि यह रही कि संगीत ने जन्माष्टमी के धार्मिक उत्सव को सांस्कृतिक अनुभव में बदल दिया। एक ओर पंडित उमेश कंपुवाले की प्रस्तुति में शास्त्रीय अनुशासन और मीरा-कृष्ण की विरहभक्ति का स्वर उभरा, तो दूसरी ओर पीयूष तांबे की प्रस्तुति ने लोकप्रिय भजनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को सहज रूप से कृष्ण भाव से जोड़ा।
कार्यक्रमों में उपस्थित श्रद्धालु देर तक भक्ति संगीत में डूबे रहे। ग्वालियर की संगीत परंपरा के संदर्भ में ऐसे आयोजन यह भी रेखांकित करते हैं कि कृष्ण भक्ति केवल मंदिर की आराधना तक सीमित नहीं, बल्कि संगीत, गायन और सामूहिक सहभागिता के माध्यम से आज भी जनजीवन में अपनी जीवंत उपस्थिति बनाए हुए है।

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