इंदौर-मध्यप्रदेश की पावन, धरा टीकमगढ़ एक बार फिर त्याग, तपस्या और आत्मजागरण का अद्भुत दृश्य देखने जा रही है। 17 अप्रैल शुक्रवार का वह पावन दिवस, जब श्रंमण संस्कृति के महामहिम पट्टाचार्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी अपने शिष्यों को जैनेश्वरी दीक्षा अपने करकमलों से प्रदान करेंगे, केवल एक महोत्सव नहीं, बल्कि आत्मपरिवर्तन का युगांतकारी क्षण होगा। आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी जिन्होंने पूरे भारत में संयम की अलख जगाई और सैकड़ों मुनियो को दीक्षित कर नमोस्तु शासन जयवंत हो को गुंजायमान किया। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया आचार्य श्री विशुद्ध सागर दीक्षा के पश्चात निरंतर भारत भूमि को कर्मस्थली बनाकर उन्होंने भगवान महावीर के अहिंसा और करुणा के संदेश को जन-जन तक पहुंचाया। भारत भूमि पर लाखों किलोमीटर पदविहार कर ऐतिहासिक चातुर्मासों के माध्यम से उन्होंने समाज को संस्कार, संयम और धर्म मार्ग पर चलने का संदेश दिया ।भावी दीक्षार्थीयो को जेनेश्वरी दीक्षा प्रदान कर उन्हें संयम जीवन की ओर अग्रसर करेंगे। यह क्षण केवल दीक्षा का नहीं, आत्मजागरण का है। यह अवसर केवल देखने का नहीं, अनुभव करने का है। यह जहां त्याग की गंगा बहेगी, वैराग्य का दीप जलेगा और हजारों श्रद्धालुओं की आंखों में भक्ति के आंसू झिलमिलाएंगे। नमोस्तु शासन जयवंत हो।
टीकमगढ में 17 अप्रैल को श्रंमण संस्कृति के महामहिम आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी देंगे जैनेश्वरी दीक्षा

