इंदौर-शाश्वत सिद्धक्षेत्र सम्मेदशिखर की पावन, वंदनीय धरा एक बार फिर त्याग, तपस्या और आत्मजागरण का अद्भुत दृश्य देखने जा रही है। 18 अप्रैल शनिवार का वह पावन दिवस, जब मुनि प्रमाण सागर अपने शिष्यों को जैनेश्वरी दीक्षा प्रदान करेंगे, केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मपरिवर्तन का युगांतकारी क्षण होगा। ऐसा प्रतीत होता है मानो 1968 का स्वर्णिम इतिहास पुनः जीवंत हो उठेगा, जब मुनि ज्ञानसागर महाराज ने एक ऐसे संत को दीक्षा दी थी, जिन्होंने आगे चलकर पूरे भारत में संयम की अलख जगाई और सैकड़ों मुनि-आर्यिकाओं को दीक्षित कर धर्मध्वजा को ऊंचा किया। उसी महान परंपरा के संवाहक मुनि प्रमाण सागर का जीवन स्वयं त्याग और तपस्या की प्रेरक गाथा है।
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं स्थानीय मीडिया प्रभारी राजेश जैन दद्दू ने बताया कि मुनि प्रमाणसागर महाराज ने नवीन कुमार के रूप में हजारीबाग की धरती पर सेठी परिवार में जन्म लिया। छत्तीसगढ़ के दुर्ग में बाल्यकाल बिताते हुए वे गुरुदेव आचार्य विद्यासागर के दिव्य व्यक्तित्व से अत्यंत प्रभावित होकर मात्र 18 वर्ष की आयु में उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर लिया। युवावस्था के सपनों का त्याग कर आत्मकल्याण की राह चुनना ही उनके जीवन की दिशा बन गया। सन् 1988 में सिद्धक्षेत्र सोनागिर की पवित्र भूमि पर उन्होंने भव्य जैनेश्वरी दीक्षा लेकर संसार से विरक्ति का सशक्त संदेश दिया। दीक्षा के पश्चात वर्षों तक मध्यप्रदेश को कर्मस्थली बनाकर उन्होंने भगवान महावीर के अहिंसा और करुणा के संदेश को जन-जन तक पहुंचाया।
वर्ष 2005 में सम्मेदशिखर की तलहटी में गुणायतन और सेवायतन की स्थापना कर धर्म को आधुनिक विज्ञान और तकनीक से जोड़ने का अभिनव प्रयास किया। लाखों श्रद्धालुओं के जीवन में उन्होंने समाधान, प्रेरणा और आस्था का दीप प्रज्ज्वलित किया। शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका योगदान अत्यंत प्रेरणादायक रहा।
इंदौर और भोपाल के ऐतिहासिक चातुर्मासों के माध्यम से उन्होंने समाज के बच्चों को संस्कार, संयम और राष्ट्रनिर्माण का संदेश दिया तथा विद्याप्रमाण गुरुकुलम की स्थापना कर भविष्य की पीढ़ी को दिशा प्रदान की। अब वही गुरूवर वर्ष 2026 में एक नया अध्याय लिखने जा रहे हैं, जब वे 15 अप्रैल को अपने शिष्यों एवं संसघ सहित सम्मेदशिखर की पवित्र भूमि पर मंगल प्रवेश करेंगे और उन्हें संयम जीवन की ओर अग्रसर करेंगे। यह क्षण केवल दीक्षा का नहीं, आत्मजागरण का है। यह अवसर केवल देखने का नहीं, अनुभव करने का है। यह आयोजन केवल इतिहास नहीं, भावनाओं का महासंगम होगा, जहां त्याग की गंगा बहेगी, वैराग्य का दीप जलेगा और हजारों श्रद्धालुओं की आंखों में भक्ति के आंसू झिलमिलाएंगे। नमोस्तु शासन जयवंत हो।

