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सावन की रिमझिम में सुरों ने रचा संगीत का मनोहारी संसार

ग्वालियर। सावन की रिमझिम फुहारों, पावस की सोंधी गंध और प्रकृति के नवहरित उल्लास के बीच रविवार की संध्या ग्वालियर की प्रतिष्ठित सांगीतिक संस्था रागायन की मासिक संगीत सभा सुरों के विविध रंगों से आलोकित रही। कहीं ध्रुपद के गंभीर, गहन और आध्यात्मिक स्वरों ने वातावरण को साधनामय बना दिया, तो कहीं बेला के तारों से झरती स्वर-लहरियों ने मन के सूक्ष्मतम तारों को स्पंदित किया। खयाल गायकी की भावपूर्ण अभिव्यक्ति, राग-विस्तार और तानों की सुघड़ बुनावट ने इस सांगीतिक संध्या को पूर्णता प्रदान की।
सावन जिस प्रकार धरती पर हरियाली और आकाश में मेघों के रंग घोलता है, उसी प्रकार रागायन की इस सभा में ध्रुपद, बेला और खयाल के सुरों ने संगीत-प्रेमियों के अंतर्मन में रस, अनुराग और आनंद के अनेक रंग भर दिए।

राग मेघ में ध्रुपद की गंभीर साधना
सभा का शुभारंभ ग्वालियर की सुप्रतिष्ठित ध्रुपद गायिका यखलेश बघेल के ध्रुपद गायन से हुआ। पावस ऋतु के अनुरूप उन्होंने राग मेघ का चयन किया। आलाप, जोड़ और झाला के क्रमिक विस्तार के माध्यम से उन्होंने राग की प्रकृति और भावभूमि को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उद्घाटित किया। उनके स्वरों में ध्रुपद की गंभीरता, स्वर-साधना की परिपक्वता और रागानुशासन की गरिमा स्पष्ट रूप से अनुभव हुई।
इसके पश्चात उन्होंने राग मेघ में दो ध्रुपद बंदिशें प्रस्तुत कीं। सूलताल में निबद्ध बंदिश ‘प्रबल दल साज जग’ तथा जलद सूलताल में निबद्ध ‘गणपति मूरत हस्त मेघ’ को उन्होंने अत्यंत सधे हुए और प्रभावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया। स्वरों की गंभीरता और पखावज की दमदार संगति ने प्रस्तुति को विशेष गरिमा प्रदान की।
उनके साथ पखावज पर संजय आफले ने समर्थ संगति की, जबकि तानपुरे पर वर्षा पाल और चेतना तिवारी ने स्वर-संवलन का दायित्व निभाया।

बेला के तारों पर झंकृत हुआ राग झिंझोटी:

सभा की दूसरी प्रस्तुति में बेला वादन ने वातावरण को एक अलग ही माधुर्य से भर दिया। कलाकार थीं सुश्री पिंकी रॉय, जिन्होंने अपने वादन के लिए राग झिंझोटी का चयन किया। उन्होंने गायकी अंग को आधार बनाते हुए राग की भाव-संपन्नता और स्वर-सौंदर्य को बेला के तारों पर अत्यंत रंजकता के साथ उकेरा।
उन्होंने राग झिंझोटी में दो बंदिशें प्रस्तुत कीं। इनमें रूपक ताल में विलंबित तथा तीनताल में द्रुत बंदिश शामिल थी। स्वर और लय के सुंदर सामंजस्य, मींड की कोमलता तथा गायकी अंग की सहज अभिव्यक्ति ने वादन को विशेष आकर्षण प्रदान किया। बेला के मधुर स्वरों ने जैसे सावन की फुहारों के बीच किसी अनदेखे भावलोक की खिड़की खोल दी। उनके साथ तबले पर प्रणव पराड़कर ने प्रभावपूर्ण संगति की।

ग्वालियर घराने की परंपरा में खिला राग यमन
सांगीतिक संध्या का समापन दिल्ली से पधारे श्री रजनीश कुमार के खयाल गायन से हुआ। वे ग्वालियर घराने के वरिष्ठ गायक पंडित एल. के. पंडित के शिष्य हैं। उन्होंने अपने गायन का आरंभ राग यमन से किया। उनके गायन में ग्वालियर घराने की परंपरागत गायकी का अनुशासन, स्पष्ट उच्चारण, सहज आलाप-विस्तार और राग की सौंदर्य-संपदा को उभारने की विशिष्ट शैली दिखाई दी।
उन्होंने तिलवाड़ा में निबद्ध विलंबित बंदिश ‘पलकन सो मग झारूँ’ प्रस्तुत की। इसके बाद तीनताल में द्रुत बंदिश ‘मंदर मन भाये’ सुनाई। राग के क्रमिक विस्तार में स्वर मानो एक-एक कर पुष्पित होते गए और तानों की सुघड़ अदायगी ने प्रस्तुति में विशेष चपलता और ओज भर दिया। उनकी गायकी में रागदारी की गहराई के साथ भावाभिव्यक्ति की सहज ऊष्मा भी अनुभव हुई।
गायन का समापन उन्होंने भैरवी में भजन ‘तब मैं जानकी नाथ कहाऊँ’ से किया। भैरवी के करुण और भक्तिरस से संपृक्त स्वरों ने संध्या के सांगीतिक वातावरण को भावपूर्ण विराम दिया।
रजनीश कुमार के साथ तबले पर वीरमणि त्रिपाठी तथा हारमोनियम पर अक्षत मिश्रा ने अत्यंत कुशल और संतुलित संगति की। रजनीश कुमार दिल्ली के एक विद्यालय में संगीत का शिक्षण कर रहे हैं। इसके साथ ही वे ‘रंगमौली’ नामक सांस्कृतिक संस्था का संचालन भी कर रहे हैं, जिसके माध्यम से संगीत और संस्कृति के प्रसार का कार्य कर रहे हैं।

दीप प्रज्ज्वलन और गुरु-पूजन से हुआ शुभारंभ
कार्यक्रम के आरंभ में मुख्य अतिथि साडा अध्यक्ष अशोक शर्मा तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे रागायन के अध्यक्ष एवं सिद्धपीठ श्री गंगादास जी की बड़ी शाला के पूरण बैराठी पीठाधीश्वर स्वामी रामसेवक दास जी महाराज ने मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर एवं गुरु-पूजन के साथ संगीत सभा का विधिवत शुभारंभ किया।
इस अवसर पर रागायन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष अनंत महाजनी, संजय देवले, अभिजीत सुखदाने, श्रीकांत कुलकर्णी सहित अनेक संगीतप्रेमी और कला-संस्कृति से जुड़े सुधीजन उपस्थित रहे।
संपूर्ण सभा में सावन की ऋतु और भारतीय शास्त्रीय संगीत का अद्भुत सामंजस्य दिखाई दिया। मेघ के गंभीर स्वर, झिंझोटी की मधुरता और यमन की उज्ज्वल राग-छटा ने मिलकर ऐसी सांगीतिक अनुभूति रची, जिसमें ऋतु, रस और राग एकाकार हो उठे।

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