उत्तम शौच धर्म – शुचिता का होना ही शौच धर्म है। लोभ कषाय के कारण मानव का मन सदा अशुचि बना रहता है। संतोष की भावना जब हृदय में प्रकट होती है तब मन में शुचिता का भाव जाग्रत होता है। इस धर्म के पालन से छोटे-बडे का भेद मिट जाता है। उत्तम शौच धर्म – धर्म की जीवन में तभी सार्थकता है जब चित्त में शुचिता हो। परपदार्थ चित्त में मलिनता को पैदा करते हैं। जो जितना बाहर के भौतिक पदार्थों से जुड़ेगा वो भीतर उतना ही अशांत हो जायेगा, शान्ति की अनुभूति एकाकी स्वभाव में है। परपदार्थ भीतर अशांति पैदा करते हैं। चित्त में अशुचिता बिना पराश्रय के नहीं आ सकती। आकुलता का नाम दुख है और निराकुलता का नाम ही सुख है। परपदार्थों से जुड़ने का नाम ही आकुलता है, मन जितना परपदार्थों से जुड़ता चला जाता है उतना ही आकुलता और अशान्ति का साम्राज्य बढ़ता चला जाता है।
लोभ का सबसे बड़ा कारण है सुख की अभिलाषा। आदमी इसी सुखाभिलाषा में अपने पूरी जिंदगी तिजोरी को भरने में लगा देता है और साँसों की संपदा खत्म हो जाती है। जहाँ आत्मा में संतोष का भाव आ जाता है बस वहीं जीवन में शान्ति और आनन्द घटित होने लगता है। बिना पाप कमाये धन नहीं आता, और पाप को छोड़े बिना धर्म नहीं आता। धर्म, शुचिता का नाम है, जीवन में शुचिता लाओ। पुण्य का उदय है तो तू जहाँ भी होगा वहीं घड़ा भरा मिलेगा और पाप का उदय होगा तो घर में रखा हुआ भी लुप्त हो जायेगा। उत्तम शौच धर्म कहता है कि स्वभाव की ओर लौटो। आत्मा का स्वभाव निर्लोभ स्वभावी है। जैन धर्म के दशलक्षण महापर्व मे आज उत्तम शौच धर्म का दिन है। सहारनपुर मे परम पूज्य भावलिंगी संत दिगंबर जैनाचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज ससंघ (30 पीछी) के सानिध्य मे “उपासक धर्म संस्कार शिविर” मे जैन धर्मानुयायी भावशुद्धि के द्वारा अपने जीवन को कर रहे है सफल |
“उत्तम आर्जव धर्म”मानव दुःखी है, पदार्थ के कारण नही, अपने ही लोभ के कारण →भावलिंगी संत श्री दिगम्बराचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज
