जैनों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्व है पर्युषण पर्व। पर्युषण पर्व का शाब्दिक अर्थ है− आत्मा में अवस्थित होना। पर्युषण का एक अर्थ है कर्मों का नाश करना। जैन मिलन अरिहंत के अध्यक्ष अजित जैन सोनू ने बताया कि पर्यूषण पर्व 10 दिनों तक चलता है, इसे दस लक्षण धर्म के नाम से जाना जाता है। ये दस लक्षण हैं- क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, संयम, शौच, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य। प्रतिदिन प्रातः सभी जैन मंदिरों में भगवान का अभिषेक, शांति धारा और विशेष सामूहिक पूजा होती है। यह दस दिन जैन धर्म के अनुयायियों के लिए बेहद ही पावन होते हैं |इन दिनों के दौरान समाज के अनेक श्रद्धालु कठोर उपवास, तप और साधना करते हैं या जो लोग व्रत नहीं भी रखते हैं, वह भी सूर्यास्त से पहले भोजन अवश्य करते हैं।
पर्युषण के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म का पालन किया गया। उत्तम आर्जव के बारे में बताया गया है कि कपट नहीं करना, माया कपट छोड़ना, सीधा और सरल होना, हमारे मन, वचन, काम में सीधापन होना, यही उत्तम आर्जव धर्म सिखाता है। हम दुनिया को तो सीधा करने में लगे रहते है पर अपने को सीधा करना नहीं सिख पाते है। अपने को ही कर्म, कर्ता और साधक बनाना, एक्त्व की भावना को दूर भगाना यही श्रेष्ठ आर्जव मार्ग है।
पर्युषण के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म का पालन परेड मंदिर में पूजा अर्चना कर किया गया।
