इंदौर, 10 अक्टूबर 2026।*विद्या सुधा देशना मंडप में तीर्थ चक्रवृती निर्यापक पूज्य मुनिपुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य के भीतर अपार शक्ति है, लेकिन जब वह अपनी सोच और सामर्थ्य को केवल निजी स्वार्थ तक सीमित कर लेता है तो उसकी व्यापक संभावनाएँ संकुचित हो जाती हैं। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि गुरु देव ने उदाहरण के माध्यम से बताया कि
महाभारत की गांधारी का उदाहरण –
गुरुदेव ने कहा कि किसी एक व्यक्ति के मोह में अपनी पूरी दृष्टि केंद्रित कर देना उचित नहीं। परिवार से प्रेम करना गलत नहीं, लेकिन परिवार के मोह में सत्य, न्याय और दूसरों के हितों की उपेक्षा करना संकुचित दृष्टि है।
स्वार्थ से बदलते हैं संबंध –
संसार में संबंधों के साथ अपेक्षाएँ जुड़ी हैं। अपेक्षाएँ पूरी होने तक संबंध मधुर रहते हैं, टूटने पर व्यवहार बदल जाता है। जो माता-पिता सर्वस्व समर्पित कर देते हैं, उन्हीं को संतानें सफल होने के बाद बोझ समझने लगती हैं – यह आत्मचिंतन का विषय है।
गृहस्थ और साधु की दृष्टि –
दोनों के पास वही आँखें, कान और मस्तिष्क हैं, अंतर केवल संकल्प और उद्देश्य का है। गृहस्थ परिवार के बारे में सोचता है, जबकि साधु समस्त जीवों के कल्याण की भावना रखता है।
महावीर के आदर्श से प्रेरणा
गुरुदेव ने कहा कि हमारी आँखें, वाणी, विचार और धन दूसरों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन के साधन बन सकते हैं। धन की सार्थकता उसके विवेकपूर्ण और परोपकारी उपयोग में है।
इस अवसर समाज श्रेष्ठी संजय पाटोदी नवीन आनंद गोधा, सपना मनीष गोधा, अशोक डोशी, हर्ष जैन,, आकाश कोयला, प्रिंसपाल टोंग्या, राहुल सेठी, डॉ जैनेन्द्र जैन राजेन्द्र नायक भूपेंद्र भोपाली सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।
– राजेश जैन दद्दू, प्रचार प्रमुख, सामाजिक संसद

