आत्म तत्त्व ही परिष्कृत होकर परमात्मा बनता है, जैसे बीज से वृक्ष – भावलिंगी संत दिगम्बराचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज

सोनल जैन की रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश मेरठ 04.04.2026

आत्म तत्त्व ही परिष्कृत होकर परमात्मा बनता है, जैसे बीज से वृक्ष – भावलिंगी संत दिगम्बराचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज

मेरा महानगर के मध्यलगा है भव्यातिभव्य आकर्षक श्री समवसरण । सम्पूर्ण मेरठ एवं अनेकों नगर शहरों से बृहद संख्या में पहुंच रहे हैं श्रद्धालु भक्त गण। श्री 1008 समवसरण महामण्डल विधान में हजारों की संख्या में श्रद्धालु इन्द्र-इन्द्राणी बनकर कर रहे हैं श्री जिनेन्द्र भगवान की महा-आराधना । मेरठ धर्मनगरी का महासौभाग्य जागा है परमपूज्य जिलागम पंथ प्रवर्तक भावलिंगी संत दिगम्बराचार्य श्री 108 विमर्शसागर जी महामुनिराज के विशाल न्चतुर्विध संघ (35 पीछी) के सानिध्य के रूप में। आचार्य प्रवर ने, श्री महावीर जयन्ती भवन में लगे भव्य समवसरण के बीच में उपस्थित धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए कहा- इस धरा पर तीर्थकर परमात्मा ही एकमात्र ऐसे महापुरुष हैं जिनकी धर्मसभा “समवसरण सभा “कहलाती है। तीर्थकर परमात्मा ही एकमात्र पुण्यात्मा होते हैं जिनके पुण्य के आगे तीनों लोक के जीवों का भी पुष्य एकत्रित कर लिया जाए तब भी तीर्थकर प्रभु के समक्ष सब जीवों का पुष्य नगव्य है। सर्वोत्कृष्ट पुष्प महापुयुष की संगति-सानिध्य से हम भी पुष्य से भरने लगते हैं। पूज्य आचार्यश्री ने जीवन जीने की समीचीन दृष्टि देते हुए कहा – आप बाजार जार से आम खरीद कर लाह और मान लीजिए उनमें एक आम सड़ा हुआ है, आप उस सड़े हुए आम का क्या करोगे? फेंक दोगे। आप उस सड़े आम को फेंक सकते हो लेकिन कोई ज्ञानी पुरुष होगा वह सड़े आम को फेंक नहीं सकता क्योंकि। वह जनता है कि भले ही आम का गूदा सड़ा है लेकिन उस सड़े आम के अंदर भी वह शक्ति मौजूद है जिससे नया आम का वृक्ष पैदा किया जा सकता है। एक ठीक इसी प्रकार, बंधुओ। आप सब भी सड़े आम हो, ‘आपका क्या होगा ? आपके अन्दर भी मिथ्यात्व, असंयम, कषाय, प्रमाद आदि विकारों की सड़न लगी हुयी है। तीर्थकर परमात्मा ने दो प्रकार की दृष्टि प्रदान की है हमें. द्रव्य दृष्टि और दूसरी पर्याय दृष्टि । आपकी एकांत दृष्टि है इसलिए आपको आम हो या आपका जीवन दोनों में आपको सड़न ही दिखाई देती है। अपने हित के लिए आपको अपने जीवन से इस सड़न को दूर करना होगा और अपने मूल तत्त्व को जानकर अर्थात आत्मतत्त्व को जानकर, श्रद्वान कर और उसी का भाश्रय कर आत्मा को परमात्मा बनाना होगा।

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