मेरठ-02.04.2026
आपके घर में जन्मी सन्तान सर्वप्रथम कोई सीढ़ी चढ़े तो जिनमंदिर की सीढ़ी चढ़ना चाहिए। ये जिम्मेदारी सन्तान की नहीं, यह जिम्मेदारी माता-पिता की है। ध्यान रहे, यदि आपकी सन्तान सर्वप्रथम जिनमंदिर की सीढ़ी चढ़ गयी तो आपके कुल वंश की कुल प्रतिष्ठा आकाश की ऊंचाईयों को छूती जायेगी। यह मांगलिक उद्बोधन महानगर मेरठ में चल रहे “श्री 1008 समवसरण महामण्डल” विधान के मध्य विशाल चतुर्विध संघ के अधिनायक परमपूज्य भावलिंगी संत दिगम्बराचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज ने दिया ।
महा अनुबान के दूसरे दिन आचार्य प्रवर ने कहा- जब आपकी सन्तान जन्म के बाद 45 दिन की हो जाये तब उसे जिनमंदिर इस-प्रकार लेकर आना जैसे आप समवसरण विधान की आराधना करने जा रहे हों। सन्तान को संस्कारित कीजिए। आज आपके परिवारों में सन्तानें जन्म तो ले रहीं हैं लेकिन पशुओं जानवरों की तरह, उन्हें कोई संस्कार नहीं दिये जा रहे हैं। सच कहूँ, वह परिवार मुर्दा है जहाँ धर्म-संस्कारों की न्चर्चा-वार्ता नहीं होती , वह समाज मुर्दा है जहाँ धर्म-संस्कारों की चर्चा-वार्ता नहीं होती या कोई धर्मानुष्ठान नहीं होता । बन्धुओं, अपने घर-परिवार को जिंदा कीजिए, अपनी समाज में धर्म-प्राण डालिए । मुर्दा परिवार और मुर्दा समाज में कभी कोई भगवान, कोई दिगम्बर मुनिराज जन्म नहीं लेते ।
परम पूज्य आचार्य भगवन् ने संस्कारों की प्रेरणा देते हुये कहा – आज आवश्यकता है परिवार में सन्तान को जन्म देने के बाद संस्कार डालने की। संस्कारों के बगैर मानव जीवन पशु तुल्य है। संस्कार ही मानव जाति की पहचान है।
परिवार समाज को जिंदा रखना है तो सन्तान में संस्कार डालिए – भावलिंगी संत दिगम्बराचार्य श्री विमर्शसागर जी मुनिराज

