ग्वालियर मेले में सजी पत्थर शिल्प परंपरा बनी सैलानियों के आकर्षण का केन्द्र

ग्वालियर 17 जनवरी 2026/ बेजान पत्थर को आकार देकर उपयोगी और कलात्मक रूप देकर जीवंत बनाना भारतीय शिल्प परंपरा की अनूठी पहचान रही है। सदियों से यह हुनर पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता आया है। शिल्पकारों को अपनी कला दिखाने तथा आजीविका अर्जित करने का सबसे सशक्त मंच सदैव से भारतीय मेले रहे हैं। इसी परंपरा को श्रीमंत माधवराव सिंधिया ग्वालियर व्यापार मेला जीवंत बनाए हुए है। मेले में सजा देशज शिल्प सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है।
इस वर्ष ग्वालियर मेले में पत्थर शिल्प की दुकानों ने भी खास पहचान बनाई है। छत्री क्रमांक 19 एवं 20 के मध्य शिल्पकार विनय कुमार द्वारा लगाई गई पत्थर शिल्प की दुकान सैलानियों को विशेष रूप से भा रही है। पत्थर से गढ़ी गईं घरेलू उपयोग की वस्तुओं से लेकर आकर्षक सजावटी सामान दूर से ही सैलानियों को अपनी ओर खींच लेते हैं। पत्थर से गढ़े गए इन शिल्प नमूनों की खरीदारी सैलानी उत्साहपूर्वक कर रहे हैं।
पत्थर शिल्पी विनय कुमार बताते हैं कि उनका परिवार लगभग आधी शताब्दी से ग्वालियर मेले में अपनी दुकान लगाता आ रहा है। यह उनका पुस्तैनी व्यवसाय और विरासत में मिला हुनर है। पहले उनके पिता श्री संजीत आदिवासी रिश्तेदारों के साथ मिलकर यह कार्य करते थे और अब वही परंपरा हम आगे बढ़ा रहे हैं। विनय कुमार गौंड जनजाति से ताल्लुक रखते हैं। विनय कुमार के अनुसार उनके पूर्वज पहले कानपुर और फिर आगरा में आकर बसे थे।
राजस्थान की खदानों से निकला मार्बल तथा ग्वालियर-चंबल अंचल के सफेद और बलुआ पत्थर को तराशकर विनय कुमार का परिवार एक से बढ़कर एक शिल्प नमूने तैयार करता है। देवी-देवताओं की छोटी-छोटी आकर्षक मूर्तियाँ, मार्बल से बने पहलवानों के पसंदीदा बादाम पीसने के कुण्डे, इलायची, लौंग व अन्य मसाले कूटने के खलबत्ते, सुरमा व दवाइयों के लिए नावनुमा खलबत्ते तथा बच्चों-बड़ों के लिए कलात्मक चकला-बेलन उनकी दुकान की खास पहचान हैं। इसके अतिरिक्त सफेद पत्थर से बनी आटा, दलिया और बेसन पीसने की चक्कियाँ भी उपलब्ध हैं। मार्बल पत्थर को मोर, फूल-पत्ते और कलश का रूप देकर तैयार की गई रंगीन घड़ियाँ भी सैलानियों का ध्यान खींच रही हैं।
सैलानी इन शिल्प नमूनों को स्मृति के रूप में अपने घर ले जा रहे हैं। विनय कुमार बताते हैं कि ग्वालियर मेले में उनकी दुकान से प्रतिवर्ष औसतन 5 से 6 लाख रुपये की बिक्री हो जाती है। वे कहते हैं कि मेलों ने ही उनके परिवार के हुनर को जीवित रखा है। ग्वालियर मेले के साथ-साथ देश के अन्य मेलों में दुकान लगाकर ही उनके परिवार की आजीविका चलती है।

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