मुरैना ( मनोज जैन नायक) पर्यूषण पर्व के दूसरे दिन बड़े जैन मंदिर में उत्तम मार्दव धर्म पर व्याख्यान देते हुए जैन संत मुनिश्री विबोधसाग़र जी महाराज ने कहा कि इस संसार में कोई किसी का नहीं हैं, यानिकि कुछ भी किसी का नहीं हैं। फिर काहे का अभिमान, काहे का अहंकार । हे भव्य आत्माओं आप किसका और क्यों घमंड कर रहे हो । जवानी का, वो दो दिन में ढल जाएगी, पैसे का, वो एक बीमारी में ही चला जाएगा, रूप यौवन का, वो एक झटके में गायब हो जाएगा । अहंकार, अभिमान, घमंड को तजकर, त्यागकर विनम्रता, कोमलता को धारण करना ही मार्दव धर्म है । मान करने से जीव को नरक, तिर्यच आदि दुर्गति के चक्कर लगाने पड़ते हैं । आज तक जितने भी जीवो ने महानता को प्राप्त किया है उन सभी ने इन दस धर्म को अंगीकार किया था ।
“ऋजोर्भावः इति आर्जवः” -अर्थात् – आत्मा का स्वभाव ही सरल स्वभाव है, इसलिये प्रत्येक प्राणी को सरल स्वभाव रखना चाहियें। यह आत्मा अपने सरल स्वभाव से च्युत होकर पर-स्वभाव में रमते हुए कुटिलता से युक्त ऐसे नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव इन चारों गतियों में भ्रमण करते हुए टेढ़ेपन को प्राप्त हुआ हैं।
उत्तम मार्दव धर्म जैन धर्म का एक प्रमुख सिद्धांत है, जिसका अर्थ है सर्वोच्च कोमलता या विनम्रता। यह अहंकार, मान-मर्यादा, धन, बल और कुल-जाति के घमंड को समाप्त करने और व्यक्ति को विनम्र बनाने का धर्म है। उत्तम मार्दव धर्म सिखाता है कि सभी चीजें नश्वर हैं, इसलिए अभिमान या दीनता के लिए कोई स्थान नहीं है। उत्तम मार्दव धर्म का मतलब अहंकार का नाश करना हैं। यह धर्म व्यक्ति के अहंकार और घमंड को चूर-चूर कर देता है । उत्तम मार्दव धर्म व्यक्ति को सच्ची विनम्रता, सच्चा सुख और शांति केवल विनम्रता से ही प्राप्त होती है, अभिमान से नहीं। यह बताता है कि धन, बल, और पद आदि सब क्षणभंगुर हैं, इसलिए इनका घमंड व्यर्थ है।
बड़े जैन मंदिर में हुए अनेकों आयोजन
दसलक्षण महापर्व के द्वितीय दिवस उत्तम मार्दव धर्म के दिन श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर की में श्री जी का अभिषेक शांति धारा पूजन विधान आदि बड़ी धूमधाम से संपन्न कराया गया । इस अवसर पर स्वर्ण कलश से श्री जी का प्रथम अभिषेक करने का सौभाग्य प्राचार्य अनिल जैन एवं शांति धारा का सौभाग्य रविंद्र कुमार सौरव जैन एवं प्रेमचंद पंकज जैन वंदना साड़ी को प्राप्त हुआ । तदुपरांत सांगानेर से आए विद्वत नीरज शास्त्री के निर्देशन में पूजन एवं विधान संपन्न कराया गया । दोपहर में मुनिश्री विलोकसागर महाराज द्वारा तत्त्वार्थ सूत्र का वाचन करते हुए उसका अर्थ समझाया गया ।
सायंकालीन समय में प्रतिक्रमण, शंका समाधान एवं आरती के उपरांत विद्वत नीरज शास्त्री ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि जो जीव जितना नीचे झुकता है, उतना ही ऊपर उठता है । हमें जीवन में भारी नहीं बनना चाहिए । मान कषाय के कारण रावण जैसे पराक्रमी को पराजय का सामना करना पड़ा था ।
पर्यूषण पर्व के दूसरे दिन मुनिश्री विबोधसागर ने समझाया उत्तम मार्दव धर्म
