इंदौर | राजेश जैन दद्दू
भारत सरकार के राजपत्र में मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय (पशुपालन और डेयरी विभाग) के अंतर्गत दिनांक 6 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित अधिसूचना 864(अ) के अंतर्गत प्रयोगशाला में पशुओं के प्रयोग, नियंत्रण प्रजनन एवं व्यापार के नियंत्रण, पर्यवेक्षण के लिए समिति से संबंधित प्रस्तावित नियम प्रकाशित किए गए हैं।
इन प्रस्तावित नियमों में कुछ ऐसे प्रावधान हैं जिन पर पशु कल्याण एवं अहिंसा की दृष्टि से पुनर्विचार आवश्यक प्रतीत होता है। राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ ने ‘ड्राफ्ट प्रिवेंशन ऑफ क्रूएल्टी टू एनिमल्स (प्रयोगशाला पशुओं के प्रयोग, प्रजनन और व्यापार का नियंत्रण और पर्यवेक्षण) नियम, 2026’ पर आपत्ति जताते हुए इसे वापस लेने की पुरजोर मांग की है। राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ के प्रचारक राजेश जैन दद्दू, राकेश गोहिल, मंयक जैन आपत्तियां दर्ज कराते हुए कहा कि।
1. खुले बाजारों और अपंजीकृत प्रजनकों से पशु ले सकेंगी प्रयोगशालाएं
जैसा कि पत्र में लिखा है जी — प्रयोगशालाएं खुले बाजारों और अपंजीकृत प्रजनकों (breeders) से पशु ले सकती हैं, और इसमें पशुओं की प्रजातियों की कोई सीमा भी नहीं है। सामुदायिक पशु, पालतू जानवर और बचाए गए (rescued) जानवर भी प्रयोगशालाओं में पहुंच सकते हैं।
सोचिए जी… कल तक जो कुत्ता गली में खेल रहा था, जो बिल्ली किसी घर में पल रही थी, वह कल प्रयोगशाला के पिंजरे में हो सकती है। यह कितना भयावह है?
2. मंजूरी देने का अधिकार CCSEA से हटकर प्रयोगशालाओं की अपनी समितियों के पास जाएगा
अब मंजूरी देने का अधिकार CCSEA से हटकर प्रयोगशालाओं की अपनी समितियों के पास चला जाएगा। इस पर कोई स्वतंत्र निगरानी नहीं होगी।
अर्थात — अब प्रयोग करने वाला ही अपने प्रयोग की मंजूरी देगा। यह तो ऐसा हुआ जैसे चोर ही थानेदार बन जाए।
3. खुली और मोबाइल सुविधाएं, बायोवेस्ट और बीमारियों का खतरा
खुली और मोबाइल सुविधाएं, बायोवेस्ट (जैविक कचरे) और बीमारियों के कारण वहां काम करने वाले लोगों और आस-पास के समुदायों के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं।
यह केवल पशुओं का प्रश्न नहीं है, यह मनुष्यों के स्वास्थ्य का भी प्रश्न है।
विशेष आपत्ति : विदेशों में प्रतिबंधित पशु-प्रयोगों का भारत में स्थानांतरित होने की आशंका
संघ ने इस विषय पर विशेष चिंता व्यक्त की है कि प्रस्तावित नियमों में यदि पशुओं पर प्रयोग, उनके प्रजनन, व्यापार, निगरानी अथवा नैतिक स्वीकृति से संबंधित प्रावधानों में पर्याप्त कठोरता के स्थान पर शिथिलता आती है, तो इसका एक अप्रत्यक्ष अंतरराष्ट्रीय प्रभाव भी हो सकता है।
ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है कि जिन देशों में पशुओं पर कुछ प्रकार के प्रयोग प्रतिबंधित हैं अथवा अत्यंत कठोर नियमों के अधीन नियंत्रित हैं, वहां की कुछ विदेशी कंपनियां, अनुसंधान संस्थाएं या उद्योग भारत में उपलब्ध अपेक्षाकृत शिथिल नियामकीय व्यवस्था का लाभ उठाने के लिए आकर्षित हो सकते हैं।
इससे भारत पशु-परीक्षण से संबंधित ऐसी गतिविधियों का केंद्र बन सकता है, जिन्हें संबंधित देशों में करना कठिन, सीमित अथवा प्रतिबंधित हो। यह स्थिति नियामकीय शिथिलता का लाभ उठाकर प्रयोगों को एक देश से दूसरे देश में स्थानांतरित करने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित कर सकती है। ऐसे में पशु-कल्याण और जैव विविधता संरक्षण के राष्ट्रीय उद्देश्यों के साथ संभावित टकराव की भी स्थिति निर्मित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकेगा।
अतः यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है कि भारत किसी भी परिस्थिति में उन पशु-परीक्षण गतिविधियों का विकल्प अथवा आश्रय-स्थल न बने, जिन्हें अन्य देशों में पशु-कल्याण संबंधी प्रतिबंधों या नैतिक मानकों के कारण सीमित अथवा प्रतिबंधित किया गया है।
संघ की मांग —
राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ की ओर से स्पष्ट मांग है —
– इस ड्राफ्ट को तत्काल वापस लिया जाए,
– खुले बाजार से पशु लेने पर पूर्ण प्रतिबंध लगे,
– मंजूरी का अधिकार पुनः CCSEA के पास रहे,
– स्वतंत्र निगरानी को और मजबूत किया जाए,
– विदेशों में प्रतिबंधित प्रयोग भारत में भी प्रतिबंधित किए जाएं।
क्योंकि भारत अहिंसा का देश है। भगवान महावीर की धरती पर बेजुबानों की चीख को अनसुना नहीं किया जा सकता।

