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जगत पूज्य निर्यापक मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज को आचार्य पद पर प्रतिष्ठित करने की अभिलाषा — यह पद की मांग नहीं, श्रद्धा की पुकार है

इंदौर
बीते कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर एक गंभीर और लंबी बहस चल रही है। विषय है — विद्वानों, मनीषियों और समाज के श्रेष्ठी वर्ग की एकराय से जगत पूज्य निर्यापक मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज को आचार्य पद पर प्रतिष्ठित करने की अभिलाषा।
विडंबना देखिए जिस विषय पर सम्पूर्ण समाज को उल्लासित होना चाहिए, उसी पर कुछ लोग प्रश्नों की गठरी लेकर बैठ गए हैं जबकि इतिहास साक्षी है कि पूर्व में भी अनेक अवसरों पर विद्वानों, मनीषियों और समाज के अग्रजों ने एकमत होकर प्रतिभासंपन्न साधुओं को आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया है। उन्हीं आचार्यों की दीक्षा परंपरा से निकले साधकों ने आगे चलकर जिनशासन(श्रमण संस्कृति) की ऐसी पताका फहराई कि उसकी कीर्ति देश की सीमाओं को लांघकर विदेशों तक गूंजी। और नमोस्तु शासन जयवंत हो रहा है
दद्दू ने कहा कि वर्तमान समय में
एक प्रश्न उठाया जा रहा है — यदि समाज की अनुमोदना से आचार्य पद प्रतिष्ठित होने लगे, तो क्या प्रत्येक साधु ऐसी अपेक्षा करने लगेगा?

इसका सरल उत्तर है — आचार्य पद कोई याचना से प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं है और न ही समाज की अनुमोदना किसी भीड़ का कोलाहल है। यह तो बहुसंख्यक बुद्धिजीवियों, विद्वानों, मनीषियों, समाज के प्रतिष्ठित भामाशाहों और व्यापक स्तर पर प्राप्त समर्थन एवं सम्मति का विषय है। समाज सर्वोपरि होती है और हर आवाज निर्णय नहीं होती और हर विरोध अंतिम सत्य भी नहीं होता।
पूर्वाचार्यों ने क्या विधान दिया?
पूर्वाचार्यों ने सम्मत विधान के अनुसार आचार्य पद प्रतिष्ठा की दो विधियों को मान्यता दी है —
प्रथम: एक आचार्य द्वारा/ द्वितीय समाज के बहुसंख्यक वर्ग की अनुमोदना से
फिर एक मान्य परंपरा पर इतनी आपत्ति क्यों? क्या परंपरा का सम्मान केवल तभी तक है, जब तक वह हमारी सुविधा के अनुकूल हो?
वास्तविकता यह है कि बहस का एक पक्ष प्रतिभा के सम्मान पर विचार कर रहा है और दूसरा पक्ष उसी प्रस्तावना के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा रहा है। काश! विरोधी भी एक बार विरोध का चश्मा उतारकर अनुमोदना की दृष्टि से देखें, तो शायद उन्हें वही तेजस्विता दिखाई दे, जिसे देखने के लिए हजारों नेत्र उत्सुक हैं।
और सबसे बड़ी बात
44 वर्षों की कठोर तप साधना, तपस्या त्याग, अगाध विद्वत्ता और जिनशासन प्रभावना के पश्चात भी जगत पूज्य के व्यक्तित्व में पद की कोई लालसा दृष्टिगोचर नहीं होती। उन्हें किसी नाम, उपाधि या प्रतिष्ठा की अपेक्षा नहीं। वे पद से पूर्व भी पूज्य थे और पद के पश्चात भी जगत पूज्य रहेंगे और उनकी साधना भीअविचल रहेगी। यह अभिलाषा उनकी नहीं, हम लाखों भक्तों और समाज की है।
भक्त की भक्ति भी तो कोई सामान्य बात नहीं! वह निर्जीव पत्थर में प्राण प्रतिष्ठा कर उसे भगवान बना देता है, तो अपने आराध्य की श्रेष्ठताओं में आचार्य पद की स्थापना की अभिलाषा क्यों न रखे?
हम किसी की प्रतिष्ठा को घटाकर अपने आराध्य की प्रतिष्ठा बढ़ाना नहीं चाहते। हम तो केवल इतना चाहते हैं कि जिस व्यक्तित्व ने अपनी साधना से पदों की सीमाओं को बहुत पीछे छोड़ दिया है, उसके प्रति समाज की श्रद्धा को एक सम्मानजनक अभिव्यक्ति प्राप्त हो।
सत्य यही है – किसी को पद मिलने से किसी का कद छोटा नहीं होता, परंतु किसी की श्रेष्ठता को पद मिलने से समाज का सम्मान अवश्य बढ़ता है।
विरोध करने वालों से विनम्र प्रार्थना है असहमति रखिए,प्रश्न कीजिए, परंतु प्रतिभा के सम्मान को प्रतिष्ठा की प्रतिस्पर्धा मत बनाइए, क्योंकि एक फूल की सुगंध से दूसरे फूल की महक कम नहीं होती।
हमारी अभिलाषा किसी के विरुद्ध नहीं, अपने आराध्य के सम्मान में है। हमारी आवाज किसी को छोटा करने के लिए नहीं, अपनी श्रद्धा को अभिव्यक्ति देने के लिए है।
जगत पूज्य! आप पद से बड़े हैं, पद आपके व्यक्तित्व से बड़ा नहीं हो सकता। किंतु लाखों भक्तों एवं समाज की यह हार्दिक अभिलाषा और समय की मांग है कि आपकी श्रेष्ठताओं को आचार्य पद की प्रतिष्ठा भी प्राप्त हो क्योंकि जगत पूज्य जैसा दूसरा कोई नहीं। अतः हमारा सभी से विनम्र अनुरोध है कि बहस-विवाद को विराम दें और समाज के निर्णय को सर्वोपरि मानकर सम्मान दें
डॉ जैनेंद्र जैन पूर्व प्रवक्ता एवं मंत्री दिगंबर जैन समाज सामाजिक संसद इंदौर एवं राजेश जैन दद्दू धर्म समाज प्रचारक एवं मीडिया प्रभारी दिगंबर जैन समाज सामाजिक संसद इंदौर

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