दिल्ली, 09 अक्टूबर 2026। दिगम्बर जैन श्रमण-संस्कृति के उत्कृष्ट उन्नायक पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने महती धर्मसभा में सम्बोधन करते हुए भक्ति, भाव विशुद्धि और कषाय त्याग का अत्यंत गहन संदेश दिया।
भक्ति और भाव –
गुरुदेव ने कहा कि “असमर्थ लोग ही भगवान की पूजा करते हैं, जो समर्थ होते हैं वे भगवान होते हैं। शून्यों के गुणों में अनुराग करना ही भक्ति है।”
भक्ति निष्काम होना चाहिए। जहाँ आकांक्षा है, वहाँ भावों की विशुद्धि का ह्रास हो जाता है। भावों की विशुद्धि पूर्वक ही भगवान एवं गुरु भक्ति करना चाहिए।
भावशून्य भक्ति, भावशून्य प्रेम व्यर्थ होता है। क्रिया के साथ भावों का संयोजन होना चाहिए। भक्ति करने से पूर्व संचित कर्मों का क्षय होता है, पुण्य वृद्धि होती है, भाव विशुद्ध होते हैं। फलतः स्वर्गादि सम्पत्ति एवं परम्परा से सिद्धत्व की प्राप्ति होती है।
कषाय कलंक, सिद्धि में विघ्न –
गुरुदेव ने कहा कि धर्मक्षेत्र में विसंवाद नहीं करना। विशुद्धि पूर्वक भक्ति करना। कषाय परिणाम नहीं करना। कषाय पूर्वक किया गया कार्य से सिद्धि नहीं होती।
चाहे धर्मक्षेत्र हो, चाहे लौकिक क्षेत्र हो, कहीं भी कषाय नहीं करना। कषाय मंद रखो। कषाय से भाव रंजित होते हैं, भाव अशुद्ध होते हैं।
पवित्र परिणाम, सिद्धि का सोपान –
पवित्र परिणाम ही सिद्धि प्रदान करते हैं। सहज, शान्ति, आनन्द चाहिए तो अपने भावों को पवित्र करो। पवित्र भावों से ही सिद्धि एवं प्रसिद्धि होती है।
गुरुदेव की अमृतवाणी से उपस्थित धर्मसभा में श्रद्धालुओं ने निष्काम भक्ति और कषाय रहित जीवन जीने की प्रेरणा प्राप्त की।
– राजेश जैन दद्दू, प्रचार प्रमुख, इंदौर

