मुरैना/द्रोणगिरी (मनोज जैन नायक) जीवन का सबसे कठिन कार्य यदि कोई है, तो वह है—छोड़ना । पकड़ना तो मनुष्य बहुत शीघ्र सीख जाता है। वह लोगों की बातें पकड़ लेता है, रिश्तों की स्मृतियाँ पकड़ लेता है, किसी के व्यवहार को पकड़ लेता है, अपमान को पकड़ लेता है, और कभी-कभी तो उन लोगों को भी पकड़कर बैठा रहता है जो बहुत पहले उसके जीवन से जा चुके होते हैं। किंतु छोड़ना—यह कला उसे कोई नहीं सिखाता।
यही पकड़ धीरे-धीरे मन का बोझ बन जाती है। जो व्यक्ति चला गया, उसकी यादों को हम बार-बार जीते हैं। जो शब्द कभी किसी ने कह दिए, उन्हें वर्षों तक अपने भीतर दोहराते रहते हैं। किसी ने आत्मसम्मान को ठेस पहुँचा दी, तो उस घटना को अपने हृदय में स्थायी स्थान दे देते हैं। परिणाम यह होता है कि हम वर्तमान में जीना छोड़ देते हैं और अतीत के कैदी बन जाते हैं।
प्रकृति हमें हर क्षण एक गहरा संदेश देती है। वृक्ष पुराने पत्तों को छोड़ देता है, तभी नई कोंपलें निकलती हैं। नदी अपने पीछे छूटे जल को पकड़कर नहीं रखती, तभी वह निरंतर आगे बढ़ती है। यदि प्रकृति भी पकड़कर बैठ जाती, तो सृजन कभी संभव नहीं होता।
हमारा शरीर भी यही शिक्षा देता है। हम भोजन ग्रहण करते हैं, पर यदि उसका विसर्जन न हो तो वही भोजन रोग का कारण बन जाता है। उसी प्रकार मन भी यदि केवल दुख, अपमान, क्रोध और स्मृतियों को संचित करता रहे, तो वह अशांत और रोगग्रस्त हो जाता है। इसलिए मन का भी समय-समय पर शुद्ध होना आवश्यक है।
छोड़ना हार नहीं है, बल्कि स्वयं को मुक्त करना है। क्षमा करना, बीती बातों को स्वीकार करना, परिस्थितियों को समझना और आगे बढ़ जाना—यही आंतरिक परिपक्वता का परिचय है। जो छोड़ना सीख जाता है, वही वास्तव में जीवन को जीना सीख जाता है।
याद रखिए, जीवन में सब कुछ हमारे नियंत्रण में नहीं होता। कुछ लोग मिलते हैं, कुछ बिछड़ जाते हैं। कुछ सपने पूरे होते हैं, कुछ अधूरे रह जाते हैं। पर जो व्यक्ति हर अनुभव को स्वीकार करके आगे बढ़ता है, वही सच्चे अर्थों में सफल और शांत जीवन जीता है।
अंततः यही सत्य है—
“जो बीत गया, उसे स्मृति बनने दीजिए;
जो सामने है, उसे जीवन बनने दीजिए।
क्योंकि पकड़ना बंधन है, और छोड़ना ही मुक्ति है।”
भाव लेखक
अंशुल जैन शास्त्री

