आज मनुष्य धन चाहता है किन्तु पुण्य-धर्म नहीं करना चाहता – भावलिंगी संत श्रमणाचार्य श्री विमर्शसागर जी

जीवन है पानी की बूंद महाकाव्य के मूल रचनाकार, संघ शिरोमणि भावलिंगी संत श्रमणाचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज महामुनिरा (ससंघ 35 पीछो) का मंगल प्रवास धर्मनगरी मेरठ में महती धर्म और संस्कारों की प्रभावना कर रहे हैं। मेरठ के बिरादरी में श्री महावीर जयन्ती भवन में उपस्थित विशाल धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा हम देखते हैं कि एक ही घर में दो भाई हैं, • एक धनवान है, दूसरा निर्धन है, एक रोगी- बीमार है दूसरा रोगादि से मुक्त नीरोग-स्वस्थ है, एक सुखपूर्वक जीवन जी रहा है दूसरा दुःखी हुआ रो-रो कर जीवन काट रहा है। आलिय कारण क्या है ? कारण है कर्म। आज मानव को मात्र दो शब्दों का अर्थ नहीं मालूम। वे दो शब्द है पुण्य और पाप । संसारी जीव कर्म को तो निरंतर कर रहा है किन्तु पुण्य और पाप का विचार नहीं करता । भो मानव! जो तूने पूर्व पर्याय में पुण्य पाप का विचार नहीं किया और पाप कर्म करता रहा। वह पापकर्म ही आज तुझे दुःख, रोग और निर्धन होने में कारण है।
आज मनुष्य धन चाहता है किन्तु पुण्य-धर्म नहीं करना चाहता । एक बात बताओ, पसीना कब आता है ? गर्मी बड़ती है तो पसीना तो अपने आप आता है। ध्यान रखो, पुण्य की गर्मी बड़ेगी तो धन का पसीना तो अपने आप आ जाएगा।
मानव सोचता है मैं आज मेहनत कर रहा हूँ। उसी से धन आ रहा है, क्या होता है धर्म-कर्म से ? ऐसे व्यक्ति से में कहता हूँ – जिस दिन पुण्य ठोकर मारेगा उस दिन करना तू मेहनत । तेरी मेहनत उस दिन बता देगी कि अकेले मेहनत से धन नहीं आता, पुण्य के साथ मेहनत से धन आता है।
धर्म दुर्गति नहीं देता, धर्म सुगति भी नहीं देता, धर्म एकमात्र मोक्ष गति देता है। चूँकि पुण्य एक मात्र धर्म के साथ रहता है इसिलिए धर्म के साथ पुष्प ही सुख-शान्ति-समृद्धि एवं सुगति में कारण होता है।

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