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दृष्टि बदलने से बदलेगी सृष्टि, दुश्मन को नहीं दुश्मनी को मिटाओ – मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज

इंदौर, 08 अक्टूबर 2026।*विद्या सुधा देशना मंडप में आज की मंगल देशना में तीर्थ चक्रवृती पूज्य मुनिपुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने अपनी अमृतवाणी में धर्मसभा को संबोधित करते हुए जीवन में दृष्टि परिवर्तन, क्षमा, करुणा, मैत्रीभाव एवं बैरभाव के त्याग का अत्यंत प्रेरणादायी संदेश दिया। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि गुरुदेव ने आगे कहा कि यदि जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाना है, तो सबसे पहले अपनी दृष्टि और विचारों को बदलना होगा। संसार को बदलने के प्रयास से पहले स्वयं को बदलने का संकल्प लेना चाहिए।

दृष्टि बदलेगी तो सृष्टि बदलेगी –
गुरुदेव ने मकान में धूप आने का उदाहरण देते हुए समझाया कि मनुष्य कई बार परिस्थितियों को बदलने के लिए निरर्थक प्रयास करता रहता है, जबकि आवश्यकता अपनी दृष्टि बदलने की होती है। जब दृष्टि बदलती है, तो वही संसार हमें नए रूप में दिखाई देने लगता है। इसलिए जीवन में बाहरी परिवर्तन से अधिक महत्वपूर्ण आंतरिक परिवर्तन है।

दुश्मन को नहीं, दुश्मनी को मिटाओ –
गुरुदेव ने कहा कि मनुष्य क्रोध और प्रतिशोध में आकर अपने शत्रु को समाप्त करने की भावना पाल लेता है, लेकिन इससे बैरभाव समाप्त नहीं होता। धर्म हमें किसी व्यक्ति के विनाश की नहीं, बल्कि अपने भीतर की शत्रुता, घृणा और द्वेष को समाप्त करने की शिक्षा देता है।

राजा और साँप की कथा के माध्यम से गुरुदेव ने समझाया कि सच्ची करुणा वही है, जिसमें मनुष्य अपने शत्रु के प्रति भी क्षमा और मैत्री का भाव रखे। जो व्यक्ति अपने विरोधी के कल्याण की भावना रख सकता है, वही वास्तविक धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ता है। उन्होंने कहा कि बैरभाव आत्मशांति और साधना में बाधक है।

क्षमा और मैत्रीभाव से होगा आत्मकल्याण –
गुरुदेव ने जैन परंपरा की क्षमा-भावना का उल्लेख करते हुए कहा –
“खम्मामि सव्वजीवाणं, सव्वे जीवा खमंतु मे।
मित्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झं न केणइ॥”

अर्थात् मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ, सभी जीव मुझे क्षमा करें। मेरा सभी जीवों के प्रति मैत्रीभाव है और मेरा किसी से बैर नहीं है।

प्रत्येक व्यक्ति को अपने मन में झाँककर देखना चाहिए कि कहीं किसी के प्रति कटुता, क्रोध या द्वेष तो नहीं है। परिवार, समाज और आपसी संबंधों में उत्पन्न मतभेदों को क्षमा एवं संवाद से दूर करना चाहिए। जीवन अनिश्चित है, इसलिए मन में बैरभाव रखकर नहीं, बल्कि क्षमा और मैत्रीभाव के साथ जीवन जीना चाहिए।

उन्होंने कहा कि दृष्टि बदलेगी तो विचार बदलेंगे, विचार बदलेंगे तो व्यवहार बदलेगा और व्यवहार बदलने से संबंधों में मधुरता आएगी। यही धर्म का वास्तविक उद्देश्य और आत्मकल्याण का मार्ग है।

धर्मसभा में समाजजनों की उपस्थिति –
संजय पाटोदी अध्यक्ष नवीन आनंद गोधा, सपना मनीष गोधा, अशोक डोशी, हर्ष जैन, आकाश आलोक कोल प्रिंसपाल टोंग्या, संजय सामरिया राहुल सेठी डॉ जैनेन्द्र जैन राकेश नायक एवं भूपेंद्र भोपाली* सहित बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी समाजजन उपस्थित रहे।

संदेश: दूसरों को बदलने से पहले स्वयं को बदलें, शत्रुता के स्थान पर सद्भाव अपनाएँ और अपने जीवन को क्षमा, मैत्री एवं करुणा से परिपूर्ण बनाएँ।

– राजेश जैन दद्दू, प्रचार प्रमुख, सामाजिक संसद, इंदौर

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