कृषि मंथन 2026ः बेहतर बीज, स्वस्थ मिट्टी और नवाचार से टिकाऊ खेती का संकल्प

ग्वालियर। राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय में आयोजित तीन दिवसीय “कृषि मंथन 2026” में कृषि के भविष्य की रूपरेखा पर गंभीर मंथन हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ कुलपति डॉ. अरविन्द कुमार शुक्ला की अध्यक्षता में हुआ। इससे पूर्व मुख्य अतिथि एवं समस्त विशिष्ट अतिथियों ने विश्वविद्यालय परिसर एवं कृषि तकनीकी प्रदर्शनी का भ्रमण किया। जिसमें कृषि वैदिक गांव और आधुनिक तकनीक के संगम को देखा और विश्वविद्यालय के कुलपति डा अरविंद कुमार शुक्ला एवं उनकी टीम की प्रशंसा की। एरोपोनिक यूनिट, हाइड्रोपोनिक यूनिट, हाईटेक नर्सरी, ट्री-हाउस आदि को देखा और सराहना की।
कार्यक्रम को अतिथियों के द्वारा किया गया सम्बोधित:
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. अरविन्द कुमार शुक्ला ने कहा कि कृषि मंथन यशस्वी मुख्यमंत्री मोहन सिंह यादव की पहल पर प्रथम बार वि.वि. में आयोजित किया जा रहा है। इस मंथन से भविष्य की कृषि का अमृत निश्चित तौर पर निकलेगा। जिस तरह से जलवायु परिवर्तन से हम जूझ रहे है। वह हम सभी भलीभांति देख रहे है। इससे निपटने के लिये हमें नये शोध, नवाचार, चिंतन और मंथन करने की आवश्यकता है। जिससे हम अच्छी गुणवक्ता के बीज तैयार कर सकें गुणवक्ता पूर्ण क्रॉप व सब्ज़ियों को विदेश तक सप्लाई कर सकें।
कृषि वैज्ञानिक चयन मंडल, नई दिल्ली के पूर्व सदस्य डॉ. बी.एस. द्विवेदी ने अपने सम्बोधित करते हुये कहा कि विकसित एवं विकासशील देशों में अच्छे बीज की महत्ता बहुत अधिक है। अब वह समय नही रहा कि हम डी.ए.पी., यूरिया आदि उर्वरक डाले हमें इनके अतिरिक्त भी मिट्टी, पानी, जलवायु आदि पर निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता है। जिस तरह से विश्वविद्यालय में ऐरोपोनिक, हाइड्रोपोनिक एवं हाई क्रॉप पर शोध कार्य किये जा रहे है। इन शोध कार्यो को किसानों तक पहुॅचाने के लिये चिंतन और मंथन की बेहद आवश्यकता है इसके लिये हमें नये नवीन तकनीकों व नवाचारों के साथ कृषि करनी होगी।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नईदिल्ली के उपमहानिदेशक (फसल विज्ञान) डॉ. डी.के. यादव ने अपने उद्बोधन में कहा कि छात्र जो आगे के भविष्य के वैज्ञानिक है वह नयी तकनीकों को विस्तृत करें। केन्द्रीय मंत्री शिवराज सिंह ने म.प्र. सरकार के लिये रोडमैप तेयार करने की बात की है। कृषि के विकास व किसानों के कल्याण के लिए जो योजना बनेगी वह दूरगामी है म.प्र. खाद्यान व दलहन में अग्रणी राज्य है नयी क्राप्स पर यहां कार्य किया जा रहा है। किसानों की आय के लिए यह मंथन बेहद आवश्यक है इसमें रा.वि.सिं. कृषि विश्वविद्यालय ने अग्रणी भूमिका निभाते हुये इस कार्यक्रम का आयोजन किया।
प्रगतिशील किसान हुये सम्मानित:-
प्रगतिशील किसान बलबिन्दर सिंह, ग्राम बड़गी सराय तहसील चिनौर जिला ग्वालियर ने प्राकृतिक संसाधन संरक्षण को ध्यान में रखते हुये शून्य जुताई उत्पादन तकनीक से गेहूॅ में प्रति हेक्टेयर 15 से 20 प्रतिशत की वृद्धि प्राप्त की है। प्रगतिशील महिला कृषक श्रीमती नीलम कुशवाह, ग्राम मुरार जिला ग्वालियर में मशरूम उत्पादन के क्षेत्र में उन्नत कृषि की है। प्रगतिशील कृषक प्रशांत सिंह तहसील भितरवार जिला ग्वालियर ने डेयरी उद्यमी के रूप में पहचान बनाने में सफल हुये।

प्रथम सत्रः-
पहले तकनीकी सत्र में “पादप प्रजनन एवं आनुवांशिकी एवं बीज क्षेत्र में नई चुनौतियाँ” विषय पर देशभर से आए विशेषज्ञों ने बदलती जलवायु, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और गुणवत्ता मानकों के अनुरूप बीज उत्पादन की रणनीतियों पर विचार रखे। डॉ. संजय कुमार ने कहा कि किसानों को समय पर गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराना ही उत्पादन बढ़ाने की पहली शर्त है। नई किस्मों का चयन और उनकी बाजार में उपलब्धता सुव्यवस्थित होनी चाहिए। डॉ. एस.के. राव ने सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के समन्वय पर जोर देते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन के दौर में ऐसी किस्में विकसित करनी होंगी जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन दें।
डॉ. एस.के. चतुर्वेदी ने “सीड हब” की स्थापना को समय की जरूरत बताया, ताकि किसानों की मांग के अनुसार बीजों का संग्रहण और वितरण किया जा सके। डॉ. देव डी. नवांगे ने उच्च गुणवत्ता वाले बीज उत्पादन के लिए स्पष्ट रणनीति बनाने की आवश्यकता जताई। वहीं डॉ. डी.के. यादव ने सुझाव दिया कि बुवाई से एक माह पूर्व ही बीज किसानों तक पहुंच जाएं, जबकि डॉ. अशोक कुमार तिवारी ने प्रशिक्षण को उत्पादन वृद्धि का अहम आधार बताया।
द्वितीय सत्रः-
दोपहर बाद आयोजित दूसरे सत्र में “पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को बढ़ाने के लिए प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन” विषय पर चर्चा हुई। डॉ. बी.एस. द्विवेदी ने कहा कि केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहना अब पर्याप्त नहीं है। मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को संतुलित पोषण प्रबंधन और नवाचार आधारित तकनीकों से दूर करना होगा। डॉ. एस.पी. दत्ता ने पुनर्याेजी कृषि और गैर-पारंपरिक पोषक स्रोतों को अपनाने की आवश्यकता बताई।
डॉ. संजीव कुमार बेहरा ने पौधों और मानव स्वास्थ्य के लिए सतत मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन को अनिवार्य बताया। डॉ. रवि शंकर ने जलवायु अनुकूल कृषि के लिए जल उपयोग दक्षता बढ़ाने पर जोर दिया। वहीं डॉ. तरुणेंद्र सिंह ने नैनो उर्वरकों की संभावनाओं और उनके व्यापक उपयोग में आने वाली बाधाओं पर प्रकाश डाला।
सत्र में विभिन्न संस्थानों के वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने विचार साझा किए और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि स्वस्थ मिट्टी, गुणवत्तापूर्ण बीज, संतुलित पोषण, जल संरक्षण और वैज्ञानिक नवाचारों के समन्वय से ही कृषि को टिकाऊ बनाया जा सकता है।
“कृषि मंथन 2026” ने यह संदेश दिया कि यदि अनुसंधान, प्रशिक्षण और संसाधन प्रबंधन एक साथ आगे बढ़ें, तो भारतीय कृषि न केवल आत्मनिर्भर बनेगी, बल्कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भी अपनी मजबूत पहचान स्थापित करेगी।

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