जैन समाज के महान तपस्वी, वात्सल्य रत्नाकर आचार्य 108 श्री विमलसागर जी महाराज का 32वाँ समाधि महोत्सव बड़ौत नगरी में अत्यंत श्रद्धा, भक्ति एवं गरिमामय वातावरण में मनाया गया। यह पावन आयोजन आचार्य श्री विमर्शसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में संपन्न हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में साधु-संतों, श्रावक-श्राविकाओं एवं श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही।
समाधि महोत्सव के अवसर पर धर्मसभा, प्रवचन, पूजन, भक्ति कार्यक्रम एवं श्रद्धांजलि अर्पण किए गए। आचार्य श्री विमर्शसागर जी महाराज ने अपने उद्बोधन में आचार्य 108 श्री विमलसागर जी महाराज के त्यागमय, तपस्वी एवं करुणामय जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि “आचार्य विमलसागर जी महाराज का संपूर्ण जीवन आत्मसंयम, अहिंसा और धर्मप्रभावना का जीवंत उदाहरण रहा है। ऐसे महापुरुष युगों-युगों तक समाज को दिशा देते हैं।” उन्होंने कहा कि आचार्य विमलसागर जी महाराज ने कठोर तपस्या, हजारों उपवास, आजीवन त्याग एवं अनुशासित साधना के माध्यम से जैन धर्म की गौरवशाली परंपरा को सुदृढ़ किया। उनके द्वारा स्थापित धार्मिक संस्कार आज भी समाज को नैतिकता और संयम के मार्ग पर अग्रसर कर रहे हैं। कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालुओं ने भावपूर्ण भक्ति गीतों के माध्यम से आचार्यश्री को नमन किया। समाजजनों ने उनके बताए मार्ग पर चलने तथा धर्म-संस्कारों को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया। आयोजन के अंत में सामूहिक शांति पाठ एवं मंगल कामनाओं के साथ महोत्सव का समापन हुआ। 32वें समाधि महोत्सव का यह आयोजन बड़ौत नगरी के लिए गौरवपूर्ण अवसर रहा, जिसमें आचार्य 108 श्री विमलसागर जी महाराज की स्मृतियों को नमन करते हुए उनके आदर्शों को आत्मसात करने का संदेश दिया गया।आचार्य 108 श्री विमलसागर जी महाराज का समाधि महोत्सव — जैन समाज के लिए अपूरणीय क्षत (समेद शिखरझारखंड)। जैन समाज के वात्सल्यालंकार, तपस्वी शिरोमणि एवं चारित्रचक्रवर्ती आचार्य 108 श्री विमलसागर जी महाराज का पावन समाधि महोत्सव अत्यंत शांत, गरिमामय एवं श्रद्धा-भाव से संपन्न हुआ। उनके समाधि समाचार से संपूर्ण देश-विदेश में शोक की लहर व्याप्त हो गई। साधु-संतों, श्रद्धालुओं एवं अनुयायियों ने इसे जैन समाज के लिए अपूरणीय क्षति बताया।
आचार्यश्री का जन्म कोसमा (जिला एटा, उत्तर प्रदेश) में आयुर्वेण कृष्ण सप्तमी, विक्रम संवत 1973 को हुआ। आपके पिता श्री लाला बिहारीलाल जी एवं माता श्रीमती कटोरी बाई जी थे। गृहस्थ अवस्था में आपका नाम नेमीचंद था। प्रारंभ से ही आप वैराग्यशील, संयमी एवं धर्मनिष्ठ प्रवृत्ति के रहे। आपने मोरेना महाविद्यालय (म.प्र.) से शास्त्री (हिंदी, संस्कृत एवं प्राकृत) की शिक्षा प्राप्त की।bआचार्यश्री ने जीवन भर कठोर तप, त्याग और साधना का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। आपने आजीवन अन्न त्याग (11 वर्ष से), दही, नमक एवं तेल का त्याग किया। अपने दीर्घ साधना जीवन में आपने 4056 उपवास सहित अनेक कठिन व्रत संपन्न किए। शुल्लक, ऐलक, मुनि तथा आचार्य पद तक की दीक्षा-परंपरा में आपने असंख्य आत्माओं को संयम पथ पर अग्रसर किया। आचार्यश्री को चारित्रचक्रवर्ती, ज्ञानभूषण, समन्वयाचार्य, करुणानिधि, वात्सल्य मूर्ति, कलिकालसर्वज्ञ जैसी अनेक उपाधियों से अलंकृत किया गया। आपके मार्गदर्शन में देश के अनेक तीर्थों पर जिनप्रतिमाओं की प्रतिष्ठा, मंदिरों का निर्माण, ज्ञानपीठ एवं धार्मिक संस्थानों की स्थापना हुई। आपने जैन साहित्य को भी समृद्ध किया जिनमें श्रीमज्जिनसहस्रनाम, मंडलविधान, पूजाविधान आदि उल्लेखनीय हैं। समाधि के पूर्व आचार्यश्री पूर्ण चेतना एवं शांति में स्थित रहे। न चेहरे पर विकार था, न शरीर में कोई कष्ट। चारों ओर अपूर्व सन्नाटा छा गया। अंतिम यात्रा अत्यंत गंभीर एवं मौन वातावरण में संपन्न हुई। यह दृश्य उपस्थित श्रद्धालुओं के हृदय को भावविभोर कर गया।
आचार्यश्री की समाधि पौष कृष्ण द्वादशी, विक्रम संवत 2051 (21 दिसंबर 1994) को श्री समवेद-शिखरजी में हुई। उनके समाधि स्थल पर देशभर से साधु-संतों एवं श्रद्धालुओं ने श्रद्धांजलि अर्पित की।
आचार्य 108 श्री विमलसागर जी महाराज का संपूर्ण जीवन त्याग, तप, करुणा एवं धर्मप्रचार का जीवंत उदाहरण रहा। जैन समाज उन्हें युगद्रष्टा आचार्य के रूप में सदैव स्मरण करता रहेगा।आचार्य 108 श्री विमलसागर जी महाराज : त्याग, तप और करुणा का युगपुरुष -समेद – शिखरजी। जैन धर्म प्रभावना के अग्रदूत, वात्सल्यालंकार आचार्य 108 श्री विमलसागर जी महाराज का संपूर्ण जीवन त्याग, तपस्या, संयम और करुणा का अद्वितीय उदाहरण रहा। आपने न केवल आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त किया, बल्कि हजारों नर-नारियों को संयम, सदाचार और अहिंसा के पथ पर अग्रसर किया। आचार्यश्री का व्यक्तित्व अत्यंत सरल, तेजस्वी एवं प्रभावशाली था। उनके मुख से निकले एक-एक वचन में तप की शक्ति और वात्सल्य की शीतलता अनुभव होती थी। उनके उपदेशों से प्रभावित होकर देश के कोने-कोने से श्रद्धालु धर्म लाभ के लिए उपस्थित होते थे। भारत ही नहीं, विदेशों में भी उनके प्रवचनों की गूंज सुनाई दी। असंख्य साधनाएँ, अपूर्व तपस्या आचार्यश्री ने अपने दीर्घ साधना जीवन में 4056 उपवास कर जैन तपस्या की उच्चतम परंपरा को जीवंत किया। चातुर्मास, वर्षायोग, कठिन व्रत, जप, ध्यान और मौन साधना के माध्यम से उन्होंने आत्मसंयम की पराकाष्ठा को प्राप्त किया। आपने आजीवन अन्न त्याग, दही, नमक एवं तेल का त्याग कर संयम का कठोर पालन किया। दीक्षा परंपरा में ऐतिहासिक योगदान आचार्यश्री के सान्निध्य में शुल्लक, ऐलक, मुनि, आर्यिका एवं आचार्य दीक्षाएँ संपन्न हुईं। हजारों श्रद्धालुओं को आपने संयम पथ की ओर प्रेरित किया। आपकी दीक्षा परंपरा आज भी जैन समाज में जीवंत एवं प्रेरणास्रोत बनी हुई है। धर्म, संस्कृति और निर्माण कार्यvआचार्यश्री के मार्गदर्शन में अनेक जिनमंदिरों, तीर्थस्थलों, जिनप्रतिमाओं की प्रतिष्ठा, धर्मशालाओं, ज्ञानपीठों एवं शैक्षिक संस्थानों का निर्माण हुआ। समवेद-शिखरजी, सोनागिरि, लोहारिया, राजगृह, ग्वालियर सहित अनेक स्थानों पर धर्मप्रभावना के स्थायी कार्य संपन्न हुए। आपने जैन संस्कृति के संरक्षण और विस्तार में अतुलनीय योगदान दिया। साहित्य सृजन से ज्ञान की धाराvआचार्य 108 श्री विमलसागर जी महाराज ने जैन साहित्य को भी समृद्ध किया। आपके द्वारा रचित एवं प्रेरित ग्रंथ आज भी साधकों और विद्वानों के लिए मार्गदर्शक हैं। आपकी वाणी सरल होते हुए भी गहन तत्वज्ञान से परिपूर्ण थी। समाधि : शांति और समत्व का अनुपम दृश्य समाधि के समय आचार्यश्री पूर्ण शांति एवं समाधिस्थ अवस्था में थे। न कोई वेदना, न कोई विकार—मानो देह स्वयं तत्व में विलीन हो रही हो। चारों दिशाओं में सन्नाटा छा गया और श्रद्धालुओं की आँखें नम हो गईं। यह दृश्य जीवन की नश्वरता और साधना की महिमा को दर्शाने वाला था। शोक की लहर, श्रद्धा का सागर
समाधि समाचार फैलते ही देश-विदेश से श्रद्धालुओं, साधु-संतों, समाजसेवियों एवं धर्मप्रेमियों ने गहन शोक व्यक्त किया। अनेक स्थानों पर श्रद्धांजलि सभाएँ आयोजित की गईं। जैन समाज ने एक स्वर में कहा कि आचार्यश्री का जीवन युगों-युगों तक प्रेरणा देता रहेगा।
आचार्य 108 श्री विमलसागर जी महाराज का 32वाँ समाधि महोत्सव बड़ौत नगर में श्रद्धा एवं भक्ति के साथ संपन्न

