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“कषाय की अग्नि से बचो, क्षमा का जल सींचो” आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी

दिल्ली के ऋषभोदय में गुरुदेव ने कहा – भोगों में सुख नहीं, सुखाभास है। समय व्यतीत हो रहा है, मृत्यु से पहले अच्छा कार्य कर लो

दिल्ली स्थित ऋषभोदय, ऋषभ विहार में विराजित दिगम्बर जैन श्रमंण संस्कृति के महामहिम पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महामुनिराज ने धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए साधना, जीवन की क्षणभंगुरता और कषायों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
साधना से ही यश
गुरुदेव ने कहा “साधक को साधना में लीन रहना चाहिए, उसका लोक में प्रचार-प्रसार स्वयं ही हो जाता है।”
उन्होंने कहा जो साधना करेगा उसका नाम अपने-आप ही होगा। नाम चाहने से नाम नहीं होता। पुण्य के उदय में अपने-आप यश फैलता है। दिखावे के लिए किया गया कार्य स्थायी नहीं होता।

जीवन क्षण-भंगुर
आचार्य श्री ने जीवन की नश्वरता पर जोर देते हुए कहा मनुष्य जीवन क्षणिक है। ओस बूंद के समान आयु भी विनाशीक है।”
रूप-सौन्दर्य सदा नहीं रहेगा। पल भर में क्या होगा पता नहीं। बीतने वाली घड़ी लौटकर नहीं आती।”*
उन्होंने श्रद्धालुओं को सचेत करते हुए कहा समय व्यतीत हो रहा है। मृत्यु हो उसके पहले कुछ अच्छा कार्य कर लो। आपका आज का पुरुषार्थ ही भविष्य में अच्छा भव प्रदान करेगा।”

कषाय की अग्नि से बचो*
मुनिराज ने चार कषायों की तुलना आग से की। लोभ भी आग है, क्रोध भी ज्वाला है, मान भी अंगारा है, माया भी अग्नि है। राग-द्वेष-मोह भी अग्नि है।”
उन्होंने कहा “चाहे चन्दन की आग हो, चाहे बांस की आग हो, दोनों ही आगें जलाती हैं।”* इसलिए सभी प्रकार की कषायों की आग से बचो और क्षमा की नीर का सिंचन करो।

भोगों में सुख नहीं, सुखाभास
गुरुदेव ने इंद्रिय सुखों को मृग-मरीचिका बताया। इंद्रिय-सुख, भोगों में सुख नहीं, वह सुखाभास है। भोगों का सुख क्षणिक है, भोगों का सुख क्षण-भंगुर है।”
उन्होंने कहा सच्चा सुख आत्मा में है, बाहरी भोगों में नहीं। भोगों के पीछे भागने से केवल दुःख और अशांति ही मिलती है।

धर्मसभा के अंत में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने गुरुदेव के अमृत वचनों का लाभ लिया और जीवन में संयम अपनाने का संकल्प लिया।

“गुरुवाणी के 4 सूत्र”*
1. साधना:* नाम के लिए नहीं, साधना के लिए जियो। यश अपने-आप आएगा
2. समय:* जीवन ओस बूंद जैसा है। मृत्यु से पहले पुण्य करो
3. कषाय:* लोभ-क्रोध-मान-माया आग हैं। क्षमा से बुझाओ
4. भोग:* भोगों में सुख नहीं, सुखाभास है। सच्चा सुख आत्मा में

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