मेरठ-परम पूज्य संघ शिरोमणि भावलिंगी संत श्रमणाचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज अपने विशाल चतुर्विध संघ के साथ मेरठ महानगर के कमला नगर स्थित श्री 1008 दिगम्बर जैन मन्दिर महावीर जिनालय में विराजमान हैं। जैन समाज के प्रत्येक घर में मंगलाचार हो रहा। है। आचार्य संघ का वात्सल्यता एवं धर्म प्रेम स्वयमेव ही आबाल-वृह को अपनी ओर आकृष्ट कर रहा है। कमलानगर के दिगम्बर जैन मन्दिर में उपस्थित धर्मसभा को सम्बोधित करते हुये आचार्य श्री ने कहा- हमें सर्वश्रेष्ठ जीवन मिला, अब हमें चाहिए कि हम सर्वश्रेष्ठ बनने का प्रयास करें। कभी दूसरों के संस्कारों से अपना जीवन सर्वश्रेष्ठ नहीं बन सकता। विचार करना, आप अपने शरीर को संस्कारित करते रहते हो, शरीर को स्वस्थ भी रखते हो; लेकिन क्या शरीर के स्वस्थ और स्वच्छ रहने से आपकी आत्मा का भला हो रहा है? ध्यान रखना, शरीर की स्वच्छता से आत्मा पवित्र नहीं हो जाता, आत्मा की स्वच्छता के लिए जिन्होंने अपने आत्मा को पवित्र बना लिया है उनके आश्रय में आना होगा । आचार्य गुरुवर ने वर्तमान परिस्थिति को इंगित करते हुए कहा आज मैं देख रहा हूँ, तन के रोगी कम हैं, मन के रोगी जादा हैं। मन का रोग क्या है? मन का रोग है दूसरों का बुरा विचारते रहना । ध्यान रहे, दूसरों का बुरा विचारने से दूसरे का बुरा हो या न हो लेकिन भो मानव! तूने दूसरे के बारे में बुरा। विचारा है तेरा बुरा, तेरा अहित उसी क्षण में हो गया है। वीतरागता की महिमा उद्घाटित करते हुए आचार्य श्री ने कहा- संसार में सभी प्राणी रागी हैं या द्वेषी हैं। संसारी जीव प्रशंसा करने से खुश हो जाता है और निंदा करने से क्षुभित हो जाता है, इस लोक में वीतरागी तो एकमात्र जिनेन्द्र देव ही हैं जो अपने निंदक अथवा प्रशंसक पर कभी भी खुश अथवा खेदखिन्न नहीं होते। आप कहो कि वीतरागी देन किसी से कुछ भी देते-लेते नहीं हैं उनसे हमें कुछ नहीं मिलता। यह आपका अधूरा विचार है, ध्यान रखना, जिस प्रकार सूर्य की किरणें दर्पण पर पड़ती हैं तो दर्पण अपनी स्वाभाविक वृत्ति से सभी किरणों को वापिस लौटा देता है, कुछ भी अपने पास शेष नहीं रखता उसी प्रकार, वीतरागी जिनेन्द्र देव की भक्ति आराधना करने से स्वयमेव ही हमारे जीवन में उत्थान होता जाता है, बिना इच्छा के ही हमें सम्पूर्ण सुख प्राप्त होते जाते हैं। समस्त देवगति के देव जिनकी आराधना करते हैं वे देवों के भी देव देवाधिदेव जिनेन्द्र देव – अरहंत देव हैं।
शरीर की स्वच्छता से आत्मा पवित्र नहीं होता – भावलिंगी संत दिगम्बराचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज

