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पवन करण का ‘स्त्री शतक’ हिंदी की अनिवार्य दस्तावेज़ी कृति है : शशिभूषण

जाने माने कवि पवन करण का नया कविता संग्रह स्त्री शतकहिंदी की अनिवार्य दस्तावेज़ी कृति है। इसे हमारे पुस्तकालयों एवं घरों में अवश्य होना चाहिए। इस किताब से स्त्रियों के प्रति हमारी दृष्टि में जो परिष्कार हो सकता है वह संभवतः प्रचलित साहित्यिक स्त्री शिक्षाओं एवं कोरे तर्कों, विमर्शों से उतना सम्भव नहीं।

भारत के मिथकों से 100 प्रसिद्ध एवं कमज्ञात दोनों प्रकार की स्त्रियों पर ऐसी काव्य कृति सम्भव हो सकती है मैं बिना पढ़े कल्पना तक नहीं कर सकता था। मेरी राय में स्त्री शतकऐसी कविताओं की किताब है जो संदर्भ ग्रंथ की तरह हमारे भावात्मक लोक को इस संसार के लिए अधिक क्रियाशील एवं मनुष्यतर बना सकती है। यह कल्पना ही की जा सकती है कि इन कविताओं को लिखने के लिए कवि पवन करण ने कितना गहन एवं विषद अध्ययन किया होगा।

कहा जा सकता है कि इस संग्रह से कवि ने न केवल समकालीन हिंदी काव्य संसार में एक बड़ी लकीर खींची है बल्कि इस कृति में पवन करण कवि एवं आचार्य के अर्धांग से निर्मित कृतिकार के रूप में प्रकट हुए हैं।

प्रायः सभी कविताओं में प्रेम, स्त्री-पुरुष संबंध एवं करणीय अकरणीय के प्रश्न ही मुख्य रहे हैं लेकिन प्राचीन भारतीय साहित्य में जाकर इन दशाओं का संक्षिप्त चित्रण करते हुए कवि आज के प्रश्नों, हक़, बराबरी एवं सामाजिक न्याय के मानकों से ज़रा भी विचलित नहीं हुए हैं।

स्त्री शतकपुरानी से पुरानी और नयी से नयी ऐसी काव्य कृति है जिसे पढ़ना सदा भारत के परस्पर घुले मिले इतिहास-मिथक के युगों युगों की यात्रा करने सरीखा रहेगा। यह काव्य संग्रह पवन करण के पिछले संग्रहों अथवा किसी भी परिवर्तनकामी माने जाने वाले हिंदी कवि के काव्य संग्रह से अधिक विद्रोही है।

यह किताब पढ़कर मैं अभिभूत हूँ। कवि का दिली शुक्रिया। इस कृति का प्राप्य मेरे लिए वाक़ई बहुत बड़ा है बशर्ते मैं इसके काव्य सत्यों को अपने बोध में शामिल कर पाऊँ। मुझे यह जानने में भी दिलचस्पी रहेगी कि मिथकों के सूदख़ोर इन कविताओं को पढ़कर कैसे पचा पाते हैं !


शशिभूषण……उज्जैन….94246 24278 

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ नई दिल्ली
मूल्य : 370/— रुपये

 

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