इंदौर, 11 अक्टूबर। जैन धर्म में आत्मशुद्धि और वैराग्य के सर्वोच्च प्रतीक माने जाने वाले केशलोच (केशलोंचन) की पावन क्रिया आज गुरु देव ने अपने हाथों से तीर्थ स्वरूप आदिनाथ जिनालय छत्रपति नगर में संपन्न की। जैसे ही गुरु देव ने निर्भयता और समता भाव से अपने केशों का लोच किया, वहां उपस्थित सकल जैन समाज “जय जय गुरुदेव” के जयकारों से गूंज उठा और श्रद्धालुओं की आंखें श्रद्धा से नम हो गईं। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू
के अनुसार आज प्रातःकालीन बेला में सामायिक और प्रतिक्रमण के पश्चात गुरु देव ने यह महाव्रत की कठिन साधना की। केशलोच जैन मुनि जीवन की 28 मूलगुणों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्रिया है, जो यह दर्शाती है कि शरीर के प्रति मोह का पूर्ण त्याग हो चुका है। यह क्रिया बिना किसी उस्तरा या कैंची के, केवल अपने हाथों से केशों को उखाड़ कर की जाती है, जो असीम कष्ट सहिष्णुता और आत्मबल का प्रतीक है।
केशलोच का महत्व –
दिगंबर जैन परंपरा में केशलोच को तपस्या का सर्वोच्च रूप माना गया है। इसके पीछे भाव यह है कि –
1. देह के प्रति निर्मोह: शरीर सजावट की वस्तु नहीं, साधना का माध्यम है।
2. कष्ट सहिष्णुता: भूख, प्यास, सर्दी-गर्मी और पीड़ा को समभाव से सहना।
3. अहिंसा की रक्षा: केशों में जीव उत्पन्न न हों, इसलिए समय-समय पर केशंलोच करना आवश्यक होता है। वरिष्ठ समाजसेवी डॉ जैनेन्द्र जैन ने बताया कि_”आज गुरु देव ने हम सभी को यह संदेश दिया है कि सच्चा सुख बाहरी श्रृंगार में नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि में है। उनका यह त्याग हम सभी गृहस्थों को संयम और सादगी का मार्ग अपनाने की प्रेरणा देता है।”_
अंत में गुरु देव ने कहा कि केशलोच केवल केशों का त्याग नहीं, बल्कि क्रोध, मान, माया, लोभ रूपी भीतरी विकारों के त्याग का भी प्रतीक है। उपस्थित समाजजनों ने गुरु देव के दीर्घ तपमय जीवन और रतनतर्य कुशल मंगल कामना की।

