मुरैना/लखनऊ (मनोज जैन नायक)। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में रविवार, 11 अक्टूबर को मेडिटेशन गुरु उपाध्यायश्री विहसंतसागरजी महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य में भव्य सरस्वती महाअर्चना एवं श्रुत स्कंध विधान का आयोजन श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ संपन्न हुआ। श्री आनंदमय पावन वर्षायोग समिति, लखनऊ के तत्वावधान में स्मृति उपवन में आयोजित इस धार्मिक अनुष्ठान में बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर धर्मलाभ प्राप्त किया। आयोजन में ज्ञान की आराध्य देवी मां सरस्वती की महाअर्चना के माध्यम से जिनवाणी, शास्त्रों और आध्यात्मिक ज्ञान के प्रति श्रद्धा व्यक्त की गई।
समाधिस्थ गणाचार्य श्री 108 विरागसागरजी महाराज के परम प्रभावक एवं आज्ञानुवर्ती शिष्य उपाध्यायश्री विहसंतसागरजी महाराज का सान्निध्य आयोजन का प्रमुख आकर्षण रहा। उनके मंगल सान्निध्य में श्रद्धालुओं को धर्म, ज्ञान, संयम और आत्मकल्याण की प्रेरणा प्राप्त हुई। कार्यक्रम में जैन धर्म की शास्त्र परंपरा, जिनवाणी की महिमा तथा जीवन में सद्ज्ञान के महत्व को विशेष रूप से रेखांकित किया गया।
उपाध्यायश्री विहसंतसागरजी के सान्निध्य में धर्माराधना
मेडिटेशन गुरु उपाध्यायश्री विहसंतसागरजी महाराज के सान्निध्य में आयोजित इस कार्यक्रम में धर्म और अध्यात्म के प्रति श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बना। जैन संतों की साधना, तप, त्याग और आत्मानुशासन की परंपरा को स्मरण करते हुए उपस्थित श्रद्धालुओं ने धर्ममय जीवन जीने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम में विधानाचार्य डॉ. अभिषेक जैन शिक्षाचार्य एवं डॉ. आशीष जैन शिक्षाचार्य, दमोह ने विधान की धार्मिक क्रियाएं संपन्न कराईं। आयोजन की सुव्यवस्थित व्यवस्था में समिति के पदाधिकारियों एवं समाज के कार्यकर्ताओं का योगदान रहा। श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेकर आध्यात्मिक वातावरण को और अधिक ऊर्जावान बनाया।
धार्मिक आयोजनों से संस्कार और संस्कृति को मिलता है बल
इस पावन अवसर पर मेडिटेशन गुरु उपाध्याय विहसंतसागरजी महाराज ने उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि सरस्वती महाअर्चना जैसे धार्मिक आयोजन केवल पूजन तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे समाज में ज्ञान, संस्कार, नैतिकता और आध्यात्मिक चेतना के प्रसार का माध्यम भी बनते हैं। ऐसे आयोजनों से नई पीढ़ी को धर्मग्रंथों, जिनवाणी और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ने का अवसर मिलता है।
लखनऊ में आयोजित इस महाअर्चना ने श्रद्धालुओं को ज्ञान की महत्ता समझने, धार्मिक परंपराओं के संरक्षण और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। उपाध्यायश्री विहसंतसागरजी महाराज के मंगल सान्निध्य में संपन्न इस आयोजन ने जैन समाज की धार्मिक आस्था, संगठनात्मक एकता और आध्यात्मिक चेतना की सुंदर झलक प्रस्तुत की।
सरस्वती महाअर्चना के भव्य आयोजन में मुख्य मंगल कलश डॉ वैभव डॉ गुंजन जैन, मंगल कलश डॉ रमेश जैन टीकमगढ़, सुरभि प्रिंस जैन, सोम्या विपिन जैन, ज्ञानमाला जैन ने स्थापित किया । समारोह गौरव के रूप में श्रीमती सपना मनीष गोधा ने सहभागिता की। दीप प्रज्ज्वलन श्रीमती कुसुम अभय शाह ने किया। द्रव्यदानदाता के रूप में श्रीमती कुसुमलता महावीर प्रसाद गंगवाल का सहयोग रहा। चित्र अनावरण श्रीमती मोहिनी ललित जैन ने किया, जबकि मंडप उद्घाटन का सौभाग्य बाबू कैलाश चंद जैन द्वारा किया गया । शास्त्र भेंट श्रीमती सुनीता राजेश जैन एवं ध्वजारोहण श्रीमती आशु नीरज जैन द्वारा किया गया ।
आयोजन में सौधर्म इंद्र के रूप में श्रीमती नीना संजय गोधा, चक्रवर्ती बनने का सौभाग्य विकास जैन परिवार को प्राप्त हुआ। ध्वजारोहणकर्ता के रूप में श्रीमती आशु नीरज जैन ने सहभागिता की। कुबेर इंद्र के रूप में श्रीमती शिखा अमृत जैन परिवार तथा महायज्ञनायक के रूप में श्रीमती छाया निर्मल जैन आशियाना को सौभाग्य प्राप्त हुआ । आयोजन में सभी पात्रों एवं सहयोगकर्ताओं के योगदान की सराहना की गई।
अतिशयकारी है मां सरस्वती की मूर्ति
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार मेडिटेशन गुरु उपाध्याय विहसंतसागरजी महाराज के पास मां सरस्वती की अतिशयकारी 1200 वर्ष प्राचीन प्रतिमा हैं, जिसे वर्ष में एक बार होने वाली सरस्वती महा अर्चना के समय ही निकाला जाता है, पूजनादि विधानादि करने के पश्चात पुनः उक्त प्रतिमा को बॉक्स में बंद कर रख दिया जाता । ये महा अर्चना का आयोजन प्रतिवर्ष होता है ।
पांच हजार से अधिक की थी उपस्थिति
विशाल एवं भव्य आयोजन में मुरैना, ग्वालियर, अम्बाह, गोरमी, मुरार, ग्वालियर, पोरसा, भिंड, आगरा, शिवपुरी एवं अन्य स्थानों से आए हुए पांच हजार से अधिक गुरुभक्तों ने महा अर्चना में अष्ट दृव्य, श्रीफल सहित अर्घ्य समर्पित किए ।
उपस्थित विशाल जन समुदाय ने माता सरस्वती की अतिशयकारी मूर्ति के दर्शन किए । जैसे ही पूज्य गुरुदेव ने मूर्ति को बाहर निकाला, तालियों की गड़गड़ाहट एवं घंटा झालर की ध्वनि से सम्पूर्ण पंडाल गुंजायमान हो उठा । सभी लोग पूजन के विशेष परिधान में सुसज्जित दिखाई दे रहे थे।


