नई दिल्ली, ऋषभ विहार, 11 अक्टूबर 2026। दिल्ली ऋषभ विहार में विराजित परम पूज्य पंचम पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने धर्मसभा में आत्मा की स्वतंत्रता पर गहन प्रवचन दिया।
गुरुदेव ने कहा कि प्रत्येक आत्मा स्वतंत्र है। कण-कण स्वतंत्र है, अणु-अणु स्वतंत्र है। संसारी आत्मा कर्मबद्ध होते हुए भी स्वतंत्र ही है।
बहुत अपेक्षा से कर्म एवं आत्मा दूध-पानी की तरह मिले हैं, पर आत्मा आत्मा है, कर्म कर्म है। अनादि से बंधे होने पर भी कर्म आत्मा नहीं हुआ, न होगा और न भविष्य में होगा। आत्मा कभी कर्मरूप परिणत न हुआ, न होगा, न है। कर्म स्वतंत्र है, आत्मा स्वतंत्र है। आत्मा चेतन्य है, कर्म जड़ है। आत्मा कभी जड़ नहीं होगा, जड़ कभी चेतन नहीं होगा।
बंध और मुक्ति का मार्ग –
जीव राग, मोह के वश कर्म बंध को करता है और वीतराग-भाव से कर्मों से मुक्त होता है।
विश्व व्यवस्था पर चिंतन –
विश्व व्यवस्था व्यवस्थित ही है, परंतु मोही-रागी जीव अपने भावों को अव्यवस्थित करके जगत को अव्यवस्थित करना चाहता है, परंतु वह कुछ भी कर नहीं पाता है। जीव को अपनी मानसिकता को व्यवस्थित करने की आवश्यकता है। वस्तु व्यवस्था तो जो है सो है।
– राजेश जैन दद्दू, प्रचार प्रमुख, इंदौर

