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‘प्रकाशक पुस्तकों का मूल्य कम कर रहे हैं या साहित्य का’ विषय पर डॉ० अभिषेक कुमार के विचार

“मूल्यहीन होने से अधिक श्रेष्ठ है अमूल्य होना”

एक आधे पृष्ठ की रचना के सृजन में एक साहित्यकार के शरीर का 10 – 20 मिलीलीटर खून तो अवश्य ही सुख जाता है तो आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि 150 – 200 पृष्ठ की एक पुस्तक लिखने में एक साहित्यकार के शरीर का कितना खून सूखता होगा ? शायद 1500 – 4000 मिलीलीटर! यह अलग बात है कि साहित्यकार को इस खून सूखने का अहसास नहीं होता है , जानते हैं क्योँ ? क्योँकि साहित्य सृजन के पीछे एक सच्चे साहित्यकार का एकमात्र उद्देश्य होता है “यश की कामना” और साहित्यकार तो इस यश की कामना के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए सदैव तैयार रहते हैं , हाँ सच्चे साहित्यकार जमीर का सौदा नहीं करते इसलिए अपमान सहने से भी परहेज करते हैं। लेकिन प्रकाशकों के फंतासी सब्जबाग और चोंचलेबाजी से उत्पन्न ग्लैमर की चकाचौंध ऐसी होती है कि एक साहित्यकार कब अपने जमीर को गिरवी रख देते हैं यह खुद उन्हें भी पता नहीं चलता है।
जमीर गिरवी रखने का ही परिणाम यह है कि एक समय में लेखकों को प्रकाशकों के द्वारा रॉयलिटी मिलती थी लेकिन आज लेखक अपनी किताबों को छपवाने के लिए प्रकाशकों को मुँहमाँगी रकम अदा करने के लिए तैयार रहते हैं। किताबों के प्रकाशन की बात तो छोड़िए आजकल लेखक एक मैगजीन में एक लेख/कविता/कहानी छपवाने के लिए मुँहमाँगी कीमत देने को तैयार रहते हैं। मैगजीनों से पारिश्रमिक लेने की बात तो दूर की कौड़ी है। अब सवाल यह उठता है कि प्रकाशकों की इस चोंचलेबाजी के पीछे का आधार क्या है- जवाब फिर वही लेखकों के अमर्यादित और शॉर्टकट के माध्यम से चाँद को छूने रूपी यश की कामना।

प्रतीकात्मक तस्वीर
आज बोधि प्रकाशन जयपुर के द्वारा प्रसारित एक विज्ञापन को देखिए “बोधि प्रकाशन सुधि पाठकों के लिए श्रेष्ठ साहित्यिक पुस्तकें उचित मूल्य पर प्रकाशित करता है। बोधि पुस्तक पर्व योजना के तहत चुनिंदा साहित्यकारों की पुस्तकें पेपरबैक में उपलब्ध कराई जा रही है। दस पुस्तकों के एक सैट की कुल कीमत मात्र 100 रुपये है। इस योजना में कुल दस सैट प्रस्तावित है।”
एक पाठक के तौर पर तो यह पेशकश बहुत आकर्षक लगती है लेकिन एक साहित्यकार के तौर पर मुझे यह पेशकश विष्णु नागर, अनामिका, जितेन्द्र भाटिया, पकंज चतुर्वेदी, रताजाराम भादू , सुरेंद्र मेनन, राजेश कुमार व्यास, मधु कांकरिया, लक्ष्मी शर्मा और मृदुला शुक्ला जैसे स्थापित साहित्यकारों की गरिमा को मिट्टी में मिलाने वाली लगती है। अगर बोधि प्रकाशन इस ऑफर के लिए साहित्यकारों की किताबों की कीमत नहीं लगाकर इसे मुफ्त में देने की पेशकश करती तो कहीं इन साहित्यकारों की गरिमा बनी रहती ऐसा मेरा मानना है। क्योँकि मूल्यहीनता से अमूल्य हो जाना अधिक श्रेष्ठ है। आज हिंदी साहित्य के लेखकों को सोचना चाहिए कि क्यों उनकी किताबें अर्थात् समाज का दर्पण फुटपाथ की सामग्री बन गयी है।
एक हकीकत यह है कि आज प्रकाशक एक लेखक से साथ महज सौदा करते हैं वो लेखक को 30-40 कॉपी देते हैं लेकिन लेखकों से अच्छी खासी रकम इस बात के लिए वसूलते हैं कि बाकी बची पुस्तकों को पुस्तक मेले और देश के विभिन्न लाइब्रेरियों में पहुंचाया जाएगा। लेकिन इस हकीकत से बड़ी एक हकीकत तो यह है कि प्रकाशकों के लिए यह पुस्तक सिरदर्द बन जाती है, क्योँकि यह पुस्तकें बिक ही नहीं पाती हैं। मैं तो कुछ ऐसे प्रकाशकों को भी जानता हूँ जो रकम वसूली कर पुस्तकें छापते हैं और लेखकों को महज पाँच पुस्तकें थमाकर अपने कर्तव्य का इतिश्री कर लेते हैं। बेचारे लेखक अगर छः व्यक्तियों को भी पुस्तक विमोचन के दौरान किताब पर व्याख्यान देने के लिए बुलाते हैं तो उन्हें वो पुस्तक प्रकाशक से खरीदकर देनी पड़ती हैं और मैं ऐसे लेखकों को भी जानता हूँ जो अपनी पुस्तक की महज दस प्रति केवल इसलिए छपवाते हैं ताकि उन्हें सेटिंग-गेटिंग के दम पर पुरस्कार मिल सके।
एक अहम सवाल यह है कि आज हिंदी साहित्य के प्रति लेखकों का आकर्षण न्यूनतम क्यों हो रहा है। इस सवाल का जवाब महज एक पंक्ति में नहीं दिया जा सकता है। इस सवाल के जवाब के लिए हमें कुछ तथ्यों पर विचार करना होगा –
1. इंटरनेट की सुलभ उपलब्धता आज पाठकों के लिए पुस्तकों के आकर्षण को कम कर रहा है।
2. डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पुस्तकों के डिजिटल वर्जन का मुफ्त वितरण।
3. सोशल मीडिया के कारण आज प्रत्येक दूसरा व्यक्ति लेखक/कवि/पत्रकार बन गया है जिसके कारण पाठकीय संस्कृति पर लेखकीय संस्कृति हावी हो गयी है।
4. लेखन के स्तर में भी क्षरण आया है।
5. आज के लेखक सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति में प्रेमचंद्र, मनोवैज्ञानिक लेखन में जैनेन्द्र, इलाचंद्र जोशी या अज्ञेय, हिंदी गजल में दुष्यंत कुमार, हिंदी कविता में निराला, प्रसाद, महादेवी वर्मा, दिनकर, बच्चन, मुक्तिबोध, नागार्जुन, धूमिल… आदि के बनाये परिधि से बाहर निकलने की कोशिश नहीं करते या फिर राजेन्द्र यादव के द्वारा स्थापित साहित्यिक यौनिकता के शिकार होकर भटकने लगते हैं। पाठकों को अब विषयों की एकरसता बासी लगने लगी है। जिससे पाठक किताबों के प्रति पूर्वाग्रही हो जाते हैं।
6 . लेखकों की छवि भी पाठकों को उनकी पुस्तक के प्रति आकर्षित करने का एक पैमाना होता है। पाठक भी सोचते हैं जो लेखक/कवि महज एक कप चाय या एक गमछा के लिए चापलूसी – चरणवंदना में लिप्त रहते हैं या मंचो पर द्विअर्थी संवाद ही जिनकी पहचान है उनकी पुस्तक तो…।
7 . तेज रफ्तार और अर्थप्रधान युग में समयाभाव भी पाठकों को पुस्तकों से दूर ले जाने के लिए जिम्मेदार है। ….. आदि।
8. लेखक संगठनों का राजनीतिक रंग में रंग जाना भी पाठकों को पूर्वाग्रही बना दिया है।
आज मुझे जमालपुर , बिहार के कवि स्व. रमेश नीलकमल जी जो कि खुद एक पत्रिका “कारखाना” निकालते थे और जो दिल्ली के एक प्रकाशन ( मीनाक्षी प्रकाशन ) के संचालक थे उनकी उस कविता का भावार्थ काफी सिद्दत से याद आ रहा है जो उन्होंने अपने घर में अपने ही प्रकाशन की किताबों के डंप हो जाने और नहीं बिकने पर अपने बेटे को संबोधित करते हुए एक कविता लिखी थी जिसका भावार्थ था… मेरे मरने के बाद तुम्हें चिता के लिए लकड़ी की जरुरत नहीं होगी, इतनी डंप किताबें हैं मेरे पास, जिन्हें चिता बनाकर मेरी लाश उसपर रख देना और अग्नि को समर्पित कर देना। यह एक व्यंग्यात्मक कविता थी जो साहित्यकारों व किताबों की दयनीय स्थिति को दर्शाती थीं। सुधि साहित्यकारों को चिंतन करना चाहिए आखिर इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है ?

डॉ० अभिषेक कुमार
युवा साहित्यकार
(कंसल्टेंट नेत्र रोग विशेषज्ञ)
बिहार

✍️ नोट: यह लेखक के मूल विचार हैं।

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