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कुतुब मीनार परिसर में मस्जिद हटाकर मंदिर निर्माण की याचिका पर हुई सुनवाई

देश में नवंबर-2019 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अयोध्या में राम मंदिर भूमि को लेकर दिए गए फैसले के बाद कुछ विवादित स्थलों से मस्जिद हटाकर मंदिर बनाने की मांग जोर पकड़ रही है। कथित तौर पर 27 हिंदू-जैन मंदिरों को तोड़कर कुतुब मीनार परिसर में बनाई गई मस्जिद को हटाकर मंदिर बनवाने के लिए लगाई गई याचिका पर वीरवार को दिल्ली के साकेत कोर्ट में सुनवाई हुई। कोर्ट में दाखिल याचिका में मस्जिद पर दावा ठोकते हुए मंदिरों के दोबारा निर्माण कराने और विधिवत पूजा करने का अधिकार मांगा गया है। कुतुब मीनार परिसर में बनी कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद को लेकर याचिका दायर की गई है।

साकेत कोर्ट में दाखिल की गई याचिका में कुतुब मीनार परिसर में बनी क़ुव्वत उल इस्लाम मस्जिद पर दावा ठोका गया और कहा गया है कि इस मस्जिद को 27 हिंदू और जैन मंदिरों को तोड़कर बनाया गया था और इसे साबित करने के लिए इतिहास में पर्याप्त सबूत हैं। लिहाजा इस मस्जिद के लिए तोड़े गए मंदिरों को दोबारा स्थापित करने और वहां पर विधि-विधान से 27 देवी देवताओं की पूजा करने का अधिकार दिया जाए। वहीं साकेत कोर्ट ने याचिका पर अगली सुनवाई 6 मार्च के लिए तय कर दी है। दिल्ली के साकेत कोर्ट ने याचिकाकर्ता को कहा कि क्या सिविल कोर्ट को धार्मिक स्थान पर कोई ट्रस्ट बनाने का आदेश देने का अधिकार है? कोर्ट ने याचिकाकर्ता को इससे जुड़े जजमेंट कोर्ट के सामने पेश करने का आदेश दिया है। तकरीबन डेढ़ घंटे चली सुनवाई के दौरान कोर्ट की तरफ से यह भी पूछा गया है कि क्या देवी-देवताओं की तरफ से ये याचिका लगाई जा सकती है? इसको लेकर कानून क्या कहता है?

याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया है कि दिल्ली के पहले मुस्लिम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक की तरफ से 1192 में क़ुव्वत उल इस्लाम मस्जिद बनवाई गई। लेकिन इस मस्जिद में मुसलमानों ने कभी नमाज नहीं पढ़ी। याचिकाकर्ता ने कहा कि इसकी वजह यह थी कि ये मस्जिद मंदिरों की सामग्री से बनी है। इमारत के खंभों, मेहराबों, दीवार और छत पर जगह-जगह हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां थीं। कुतुब मीनार परिसर में बनी इस मस्जिद में उन मूर्तियों और धार्मिक प्रतीकों को आज भी देखा जा सकता है।

याचिका में सिलसिलेवार ढंग से बताया गया है कि इतिहास के प्रसिद्ध गणितज्ञ और खगोलविद वराहमिहिर ने ग्रहों की गति के अध्ययन के लिए विशाल स्तंभ का निर्माण करवाया था। जहां फिलहाल कुतुब मीनार परिसर है। इस स्तम्भ को ध्रुव स्तंभ या मेरु स्तंभ कहा जाता था। मुस्लिम शासकों के दौर में इसे कुतुब मीनार नाम दिया गया था। याचिका के मुताबिक इसी परिसर में 27 नक्षत्रों के प्रतीक के तौर पर 27 मंदिर थे। इनमें जैन तीर्थंकरों के साथ भगवान विष्णु, शिव, गणेश के मंदिर थे। जिन्हें तोड़कर इस मस्जिद को बनाया गया। भारतीय पुरातत्व सर्वे का बोर्ड भी यही बताता है कि उसे 27 हिंदू-जैन मंदिरों को तोड़ कर बनाया गया है। याचिका में कहा गया है कि इमारत के बारे में पूरी जानकारी होते हुए भी तब की सरकार ने हिंदू और जैन समुदाय को अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया। जबकि मुस्लिम समुदाय ने जगह का कभी धार्मिक इस्तेमाल किया ही नहीं। इसके अलावा ये वक्फ की संपत्ति भी नहीं है। इसलिए उनका कोई दावा नहीं बनता।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अब इस मामले में 5 मार्च तक सभी जानकारियां उपलब्ध कराने को कहा है। साथ ही, याचिकाकर्ता को इससे जुड़े जजमेंट कोर्ट के सामने पेश करने के आदेश दिए हैं। 6 मार्च को कोर्ट इस मामले में दोबारा सुनवाई करेगा। साकेत कोर्ट में यह याचिका पहले जैन तीर्थंकर ऋषभदेव और भगवान विष्णु के नाम से दाखिल की गई हैं। याचिकाकर्ता ने इतिहास में दर्ज जानकारी के आधार पर बताया है कि आज जिसे हम महरौली के नाम से जानते हैं, वह दरअसल मीरावली थी, जिसको चौथी सदी के शासक चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक वराहमिहिर ने बसाया था।

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