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हरियाणा में पास हुआ ‘राइट टू रिकॉल’ बिल, काम न करने पर सरपंच को हटा सकेंगे ग्रामीण

ग्राम पंचायतों में चुनाव जीतने के बाद जनप्रतिनिधि गांव के विकास पर ध्यान देने की बजाय अपने बैंक बैलेंस को बढ़ाने पर ध्यान देने लगते हैं। जिससे विकास के मामले में गांव पिछड़ता चला जाता है। अब तक चूंकि ग्राम पंचायत चुनाव विशेष परिस्थितियों को छोड़कर पांच साल में ही होते रहे हैं इसलिए ग्रामीण चाह कर भी लापरवाह सरपंच के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर पाते थे। किंतु अब हरियाणा में खट्टर सरकार ने ग्रामीणों को ‘राइट टू रिकॉल’ की ताकत दे दी है जिससे ग्रामीण काम न करने वाले सरपंच को वोटिंग के आधार पर गांव के मुखिया की कुर्सी से हटा भी सकते हैं।

‘राइट टू रीकॉल’ बिल के बारे में बात करते हुए राज्य के उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला ने कहा कि पंचायत विभाग के पास अक्सर इस तरह की शिकायतें आती थीं कि सरपंच मनमानी करके ग्रामीणों की जनभावनाओं के खिलाफ कार्य कर रहा है। हर साल इस तरह के सैकड़ों शिकायतें ब्लॉक स्तर से लेकर जिला स्तर और प्रदेश मुख्यालय तक पहुंचती हैं। हालांकि इस बिल के पास होने के बाद अब ग्रामीणों के पास यह अधिकार आ गया है कि अगर सरपंच गांव में विकास कार्य नहीं करवा रहा है तो उसे बीच कार्यकाल में ही पद से हटाया भी जा सकता है।

‘राइट टू रिकॉल’ की प्रक्रिया की बात की जाए तो उपमुख्यमंत्री ने इस बारे में बताया कि सरपंच को हटाने के लिए गांव के 33 % मतदाता अविश्वास लिखित में शिकायत संबंधित अधिकारी को देंगे। यह प्रस्ताव खंड विकास एवं पंचायत अधिकारी तथा सीईओ के पास जाएगा। इसके बाद ग्राम सभा की बैठक बुलाकर 2 घंटे के लिए चर्चा करवाई जाएगी। इस बैठक के तुरंत बाद गुप्त मतदान करवाया जाएगा और अगर 67 % ग्रामीणों ने सरपंच के खिलाफ मतदान किया तो सरपंच पदमुक्त हो जाएगा। सरपंच चुने जाने के एक साल बाद ही इस नियम के तहत अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकेगा।

यहां ‘राइट टू रिकॉल’ को लेकर ग्रामीणों को विशेष बातों का ध्यान रखना होगा कि अगर अविश्वास प्रस्ताव के दौरान सरपंच के विरोध में निर्धारित दो तिहाई मत नहीं डलते हैं तो आने वाले एक साल तक दोबारा अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकेगा। इस तरह ‘राइट टू रीकॉल’ एक साल में सिर्फ एक बार ही लाया जा सकेगा।

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