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राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रहे महेंद्र सिंह की कोरोना काल में छूटी कोच की नौकरी, अब तल रहे हैं पकोड़े

वैश्विक महामारी कोरोना वायरस से हर कोई प्रभावित नजर आ रहा है। केंद्र और राज्य सरकारें बेशक आमजन की आर्थिक रूप से सहायता करने की बातें करती रही हों किन्तु समाज में हमारे चारों ओर गरीबी और बेरोजगारी से ग्रस्त हुनरमंद लोगों की दुखद स्थिति को देखते हुए नेताओं के झूठे वादों से पर्दा उठ ही जाता है। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के एक छोटे से कस्बे शाहवपुर के रहने वाले महेंद्र सिंह अपने पिता की तरह तीरंदाजी में नाम कमाना चाहते थे। महेंद्र के पिता राष्ट्रीय स्तर के बड़े तीरंदाज थे। अपने पिता को देखते हुए महेंद्र ने भी तीरंदाजी की कई प्रतियोगताओं में दर्जनों मैडल अपने नाम किए, परिणामस्वरूप वे राष्ट्रीय स्तर के तीरंदाज भी बने। इसके बावजूद महेंद्र को बाराबंकी के केडी सिंह बाबू स्टेडियम में बतौर कोच संविदा(contract) नौकरी मिली। करीब 18 साल से संविदा पर ही काम करते हुए महेंद्र जैसे-तैसे करके अपनी आजीविका चला रहे थे किंतु अब कोरोना काल में उन्हें नौकरी से ही हटा दिया गया। इस वैश्विक महामारी के दौरान महेंद्र जैसे और संविदा पर काम कर रहे 450 कोच को भी निकाल दिया गया है। तीरंदाजी के कोच और राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रहे महेंद्र का कहना है कि अब वह किसी बच्चे को तीरंदाजी सिखाकर उसका भविष्य बर्बाद नहीं करेंगे।

अपने पिता के साथ दिन-रात कड़ी मेहनत करते हुए प्रतियोगिताओं में मेडल जीतकर लाते थे। फिर संविदा पर कोच बनकर ही सही स्टेडियम में बच्चों को खेल के गुर सीखाते हुए प्रेरित करते थे और अब घर के बाहर दरवाजे की मुंडेर पर बैठे महेंद्र चूल्हे में पकौड़ियाँ और समोसे तल रहे हैं तथा बगल में एक तख्त पर रोजमर्रा की जरूरत के कई सामान बेचने के लिए रखे हुए हैं, कुछ इस तरह देश में राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रहे महेंद्र का जीवन ढलान की ओर अग्रसर नजर आ रहा है जिसमें ना तो सरकार की तरफ से कोई सहयोग मिल पा रहा है और ना ही किसी सामाजिक संस्था ने आकर प्रोत्साहित करने का काम किया है।

कोरोना काल में राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रहे महेंद्र सिंह पकोड़े तलकर अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं

राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रहे महेंद्र सिंह पकोड़े तलते हुए बताते हैं, “मैंने अपना जीवन खेल को दे दिया, दर्जनों मैडल जीते, साल 2002 से मैं उत्तर प्रदेश के खेल विभाग में प्रशिक्षक रहा तीरंदाजी का, बाराबंकी के अलावा गोरखपुर, सोनभद्र, मिर्जापुर समेत कई जनपदों में बच्चों को सिखाया, मेरे सिखाये हुए 20 से ज्यादा बच्चे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में खेलें, कई बच्चे सेना में नायाब सूबेदार तक की रैंक पाए, आईटीबीपी वगैरह और बीएसएफ में भर्ती हुए हैं, मगर आज खुद मेरे यह हालात हैं।”
भावुक होते हुए महेंद्र आगे बताते हैं, “24 मार्च से उत्तर प्रदेश खेल निदेशालय द्वारा हम लोगों की प्रशिक्षण सेवाएँ समाप्त कर दी गईं, हमारे जैसे 450 कोच आज बेरोजगार हो गए, कोई मानदेय भी नहीं मिला, न हम लोगों को एक पैसा मिला, और हम लोगों की सेवाएँ भी समाप्त कर दी गईं। इतने सालों बाद आज भुखमरी से जूझते हुए मुझे यह पकौड़ी का स्टॉल लगाना पड़ रहा है।”

अनेक युवाओं की जिंदगी संवारने वाले महेंद्र सिंह के परिवार में छह लोग हैं। माँ, पत्नी, दो बच्चे, इसके अलावा घर में बड़े भाई भी हैं, मगर उनका मानसिक संतुलन ठीक न होने की वजह से वो कुछ काम नहीं कर पाते। पांच महीनों से अपनी नौकरी खो चुके महेंद्र अपने हालात पर उत्तर प्रदेश में खेलों की अव्यवस्था को लेकर प्रदेश सरकार के रवैये पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, “उत्तर प्रदेश में खेलों की बहुत दुर्दशा है, तमाम प्रतिभाएं जो अपने प्रदेश में निकलती हैं वो पंजाब-हरियाणा जैसे खेलों को तरजीह देने वाले राज्यों में चली जाती हैं, मेरी ही हालात यह है तो मैं किस मुंह से अपने बच्चे से या किसी दूसरे के बच्चे से कहूँ कि वो तीरंदाजी में अपना करियर बनाएं या तुम्हें नौकरी मिल जायेगी, मैं खुद 20 साल के करियर के बाद पकौड़ियाँ तल रहा हूँ।” निराश होकर महेंद्र कहते हैं, “मैं अंतरात्मा से बहुत दुखी हूँ और कम से कम अब अपने बच्चे या किसी भी बच्चे को तीरंदाजी में लाने का प्रयास नहीं करूँगा।”

सांकेतिक तस्वीर

सालों कड़ी मेहनत के बाद उनके जैसे कई खेलों के प्रशिक्षक कोरोना काल में बेरोजगार हो गए। महेंद्र बार-बार अपने मेडलों की ओर देखते हैं, शायद इस उम्मीद में कि संविदा पर ही सही मगर सरकार कम से कम उनकी नौकरी उनको वापस दे दे।

बता दें कि दो वर्ष पूर्व एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से अपर्याप्त नौकरी सृजन के बारे में पूछा गया था तो उन्होंने कहा था कि अगर कोई पकौड़ा बेचकर प्रतिदिन 200 रुपये कमाता है तो उसे भी नौकरी के तौर पर माना जाना चाहिए। पीएम मोदी के इस बयान के बाद देशभर में युवाओं द्वारा विरोध प्रदर्शन किया गया था और विपक्षी दलों द्वारा इस बयान की आलोचना की गई थी।

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