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सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या मामले पर दिनेश दिनकर का लेख !

उसके नाम के अलावा आप जानते ही क्या हो उस शख्स के बारे में…..?

अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने की आत्महत्या । टेलीविजन चैनल पर धारावाहिक से कैरियर की शुरुआत की, फिर फिल्मी सफर शुरू हुआ और अब जिंदगी का सफर ख़त्म । बस ! इसके अलावा चौदह जून की सुबह होने से पहले कितने लोगों को मालूम था कि अभिनेता सुशांत डिप्रेशन के शिकार हैं या उनका ऐसा कोई इलाज चल रहा है या फिर उनके जीवन में क्या-क्या परेशानियां हैं ।

किसी शख्स की आत्महत्या की खबर सुनकर हम अक्सर यही बातें करने लगते हैं कि यह बुजदिलों का काम है, आर्थिक रूप से संपन्न था फिर भी ऐसा कदम क्यों उठाया । जरूर लड़की/लड़के का चक्कर रहा होगा , परिवार ने पढ़ाई के लिए डांट दिया होगा, पति-पत्नी में कहासुनी तो चलती रहती है, आजकल के बच्चे छोटी-छोटी बातों पर आत्महत्या करने की कोशिश करने लगते हैं , स्कूल/नौकरी में किसी से कहासुनी हुई होगी….. इत्यादि । यह बात कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है कि लोगों की इसी तरह की असंवेदनशील, उत्तेजक हरकतों के कारण समाज में आत्महत्या के मामले बढ़ते जा रहे हैं । अक्सर कहा जाता है कि दोस्तों, शुभचिंतकों, या किसी जानकार से समय रहते बात कर ली होती तो आत्महत्या करने से बचा जा सकता है । हममें से कितने ऐसे लोग हैं जो किसी अपने दोस्त, शुभचिंतक के फोन आने पर उसकी मूल समस्या जानने की कोशिश करते हैं, तुरंत सहायता करने के लिए तैयार हो जाते हैं । दरअसल हम अपने समय, आर्थिक स्थिति , परिवार-कार्यस्थल के माहौल इत्यादि का हिसाब करने के बाद ही प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं । हम उसकी मनोस्थिति को समझ ही नहीं पाते हैं । एक मुख्य समस्या यह भी है कि शायद समाज में उस स्तर के दोस्तों की बहुत कमी है जो अपनों की मनोस्थिति को समझ सके । उसकी गोपनीय बातों को खुद तक सीमित रख सकें ना कि किसी तीसरे शख्स को उसकी गोपनीय बातें बताकर उसका मजाक उड़ाएं । दोस्त केवल वह नहीं होता जो आपके साथ हंसी-मजाक करे, पार्टी-मस्ती करे बल्कि वह अच्छा दोस्त होता है जो आपकी समस्याओं को, भावनाओं की कद्र करे और किसी अन्य के साथ साझा करने की बजाय आपकी सहायता करे ।

https://youtu.be/UqQ3jfHAYso

किसी काम को गलत कह देने से लोगों की नजरों में वह काम गलत नहीं हो जाता है । अतः हमें कुछ संवेदनशील विषयों पर समाज में, परिवार में, कार्यस्थल पर बलात्कार और अपराधियों की मानसिकता, आत्महत्या, स्त्री जीवन में पीरियड्स की भूमिका, अलग-अलग पीढ़ियों के बीच वैचारिक दृष्टिकोण में अंतर इत्यादि पर अलग-अलग बिंदुओं जैसे इनके कारण, मजबूरी, समाधान, संवैधानिक व्यवस्था, सामाजिक दृष्टिकोण, मानव शरीर में हार्मोनल परिवर्तन इत्यादि को ध्यान में रखते हुए विचार-विमर्श करते रहना चाहिए । ताकि उन बिंदुओं से जुड़ाव महसूस कर रहे लोग आपके बीच में या अकेले में आपसे बात कर सकें, अपनी समस्या साझा कर सकें ।
जल्दबाजी में कुछ भी कह देने से, अपना‌ निर्णय थोंपने से आप एक अच्छे दोस्त, शुभचिंतक नहीं बन सकते हैं बल्कि धैर्य के साथ किसी को सुनने से, उसकी परिस्थितियों का अध्ययन करने से और फिर जिम्मेदारी के साथ सुझाव देने से जरूर आप एक अच्छे दोस्त साबित हो सकते हो । यह अच्छी दोस्ती केवल और केवल हमउम्र में नहीं बल्कि पिता-पुत्री, माता-पुत्र , घर के बुजुर्गो और बच्चों, विद्यार्थियों और शिक्षकों, कार्यस्थल पर सहयोगियों या जूनियर-सिनीयर के बीच, पार्क में, बस स्टैंड पर , इत्यादि कहीं भी किन्हीं के भी बीच में हो सकती है । जिनसे आप या आपसे कोई अपने मन की बात विश्वास के साथ कह सके और गोपनीयता की गुंजाइश बनी रहे । अतः एक अच्छा दोस्त बनने की कोशिश कीजिए जिससे आप आसपास बढ़ रही आत्महत्या की घटनाओं को कम कर सकें ।
धन्यवाद !

दिनेश दिनकर

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One Comment

  1. बहुत ही अच्छे लाभप्रद विचार। वास्तव में एक सच्चा दोस्त वही जो बुरे वक्त में दोस्त का साथ दे और जमाने से रुसवा होने से बचाये।

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