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पवन करण का ‘स्त्रीशतक’ – कवि की मिथकों पर पकड़ और उसके आधुनिक मूल्यबोध का उत्कृष्ट उदाहरण है : शम्भूनाथ शुक्ल

इस कविता संग्रह में ऐसी तमाम स्त्रियों के मनोभावों को पढ़ने की कोशिश कवि ने की है। और उनकी नियति की व्याख्या अद्भुत तरीक़े से की है। इसमें परशुराम की माँ रेणुका की व्यथा है तो इन्द्र की पुत्री जयन्ति की पीड़ा को कवि ने भाव प्रदान किए हैं। जयन्ति को इन्द्र ने राजा बलि का राज्य हथियाने के लिए बूढ़े शुक्र को सौंपा था। उधार की जवानी लेने वाले राजा ययाति ने विश्वाचि अप्सरा को संबोधित करते हुए अपने ग्लानि भाव को दर्शाया है। जन्मान्ध ऋषि दीर्घतमा मामतेय द्वारा राजा बलि की स्त्री सुदेष्णा को पुत्रप्राप्ति हेतु वीर्यदान की कथा के ज़रिये कवि ने ऋषि की कामलिप्सा को उकेरा है।

तारा, कुंती, द्रौपदी, अहिल्या, मंदोदरी ये पंच कन्याएँ हैं। मेरी दादी मुसम्मात कौशिल्या देवी सुबह-सुबह इनका नाम बुदबुदाया करती थीं, ठीक उन पंडितों की तरह जो सीत्ताराम-सीत्ताराम या राधेश्याम-राधेश्याम रटा करते हैं। जब मेरी समझ बढ़ी और मैंने रामायण- महाभारत आदि ग्रंथ पढ़े तो लगा कि अरे ये पाँचों कन्याएँ भारतीय माइथोलॉजी में प्रतिष्ठित स्त्रियाँ नहीं हैं। तारा ने अपने पति बालि की मृत्यु के बाद अपने देवर सुग्रीव से पुनर्विवाह किया। कुंती तो शादी के पूर्व ही सूर्यदेव की अंकशायिनी बनीं और कर्ण को जन्म दिया। द्रोपदी पाँच पुरुषों की एक ही समय पत्नी रहीं, यह जगज़ाहिर है।

अहिल्या ने इंद्र के साथ रमण करने के लिए अपने पति ऋषि गौतम से छल किया और चंद्र ने उसका साथ दिया। मंदोदरी, जो मय दानव की पुत्री तथा राक्षसराज रावण की पत्नी थी, का पुत्र मेघनाद उसके पति रावण का पुत्र नहीं था। ऐसी स्त्रियों को पंचकन्याओं में कैसे प्रतिष्ठित किया गया? मगर मैं अपनी दादी से यह कभी पूछ नहीं सका। क्या पूछता, मेरी दादी और मेरी माँ सिर्फ़ अपना नाम लिखने तक ही पढ़ी थीं। अपने पिता से पूछता, तो वे भी डाँटते। पर डॉक्टर राम मनोहर लोहिया को पढ़कर मैंने इन स्त्रियों की निर्भीकता और परवर्ती काल के सामाजिक मूल्यों पर पुरुषों के अंकुश को पढ़कर जाना कि ये पंचकन्याएँ पापिनी नहीं बल्कि ये तो समाज की नायिकाएँ हैं। इसीलिए सुबह-सुबह इनका नाम लेने की परंपरा चली थी।

यही तो सनातन परंपरा की विशेषता है कि भारत में कभी भी उनकी नहीं चली जो कोई संहिता या स्मृति से समाज को चलाने के प्रयास करते रहे। इसीलिए यहाँ न कभी ब्राह्मण का वैदिक चला न केशव सेन का ब्राह्मो न प्रार्थना समाज न आर्य समाज और न ही देव समाज। यहाँ फक्कड़ और मस्त लोग ही प्रतिष्ठित हुए। तुलसी अलख को नहीं भगा सके। यहाँ बुद्ध चले, गोरख चले, कबीर चले और गाँधी को प्रतिष्ठा मिली।

यह काव्य संग्रह कवि की मिथकों पर पकड़ और उसके आधुनिक मूल्यबोध का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसे हर एक को पढ़ना चाहिए। उन्हें भी जो मिथक से आँख चुराते हैं और उन्हें भी जो प्राचीन भारतीय मिथकों को ही आदर्श समझते हैं।

शंभूनाथ शुक्ल
संपादक
निवाण टाइम्स
मो. 9582888031

भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित इस पुस्तक का मूल्य है कुल 370 रुपये।

 

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