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सप्ताह की ​कविता में इस बार कवि पवन करण की कविता ‘रिश्तेदार’

रिश्तेदार

 

हमें लगता है यहां आकर अब हम भद्रजन हो गये हैं
जहां हमारे बाप—दादा रहे बरसों
वहां से निकल इस कालोनी में
बना लिया है हमने अपना मकान
जिसमें छोटा—सा बगीचा है और पोर्च भी

हमें लगता है उन कथरियों से हमारा वास्ता
अब कभी नहीं पड़ेगा जिन पर
लिटा—सुलाकर हमारी मां ने हमें पाला
उन बर्तनों से जिनमें सालों हमने खाई रोटी,
पिया पानी, नहाया, धोया फैलाया समेटा
उन खटियों से जिनकी गोद जैसी झूल में
काटी हमनें अपनी सैकड़ों रातें

हम समझे भी क्यों नहीं खुद को अलग
यहां हेंड पंप के आगे न तो पानी भरते हुए
मोहल्ले को उधेड़ती बुनती औरतें है और न ही
झुंड बनाकर ताश के खेल में दिन गंवाते आदमी
यहां हम फालतू भी हैं तो अपने घरों में हैं
सड़कों पर या मोहल्ले के चौक में नहीं,

और वहां तो हम चड्डी बनियान में घर से बाहर
निकल भी आया करते थे और यहां
यहां बिना कुर्ते—पाजामें के निकल पाना
जैसे अपने हाथों इज्जत धूल में मिला लेना अपनी

हमारे बच्चे तो पहले से ही कान्वेंट स्कूलों में
पढ़ रहे थे अपने परीक्षा परिणामों में
कम प्राप्ताकों के बावजूद वे यहां आते ही
कालोनी के बच्चों में ऐसे घुल मिल गये
जैसे आसानी से अलग कर दिये जाने
को उपलब्ध  बड़े ‘आ’ में छोटा ‘अ’

देखा—देखी मैं भी औरों की तरह सुबह उठकर
देने लगा बगीचे में पानी, करने लगा
रात को सोने से पहले पेस्ट
पत्नी सीखने लगी घर में ही ओवन पर केक बनाना
और टेबल से उठकर बिना पढ़े ही रोजाना
रद्दी मे पहुंचने लगा अंग्रेजी अखबार
फिर इतना सब होने के बाद
हम खुद को भद्र क्यों न समझें
क्यों ने घूमें अपने बढ़े हुए स्तर में गोल—गोल

एक बात यहां आकर जो हमें सबसे ज्यादा अखरती है
वह हमारे रिश्तेदारों को लेकर है
वे अब भी ग्रामीण हैं और हमारे अनुसार गंवार भी
वे जब चाहे होकर इकट्ठे दो—तीन
अपने मैले—कुचैले कपड़ों और प्लास्टिक के जूतों में
हमारे कालोनी वाले मकान पर आ धमकते हैं

अब ये रिश्तेदार कोई छोटी—मोटी वस्तुएं तो नहीं
जिन्हें कहीं छिपा लिया जाए, वे आते हैं
तो घर के बाहर भी खड़े होते हैं
और छत पर भी टहलते हैं
कालोनी वालों के सामने उन्हें अपना
रिश्तेदार कहते हमें झिझक होती है
जबकि वे हमारे खास रिश्तेदार
मामा, चाचा, साले, ससुर, भतीजे और समधी हैं

वे हमारे ऐसे रिश्तेदार हैं जो आते समय अपने साथ
नहाने—धोने के लिये अपना तौलिया भी नहीं लाते
वे बिलकुल नहीं बदले हैं
डायनिंग टेबल पर खाना खाते
उन्हें झिझक होती है और वे अपनी थाली लेकर
जमीन पर आलथी—पालथी मार कर बैठ जाते हैं
वे हमारे बराबर आगे नहीं बढ़ सके
वे नहीं ढूंढ सके हमारे बराबर बेईमानी के अवसर

वे जब भी आते हैं अपने साथ पापड़—बड़ियां
अचार,शहद, और दालें लेकर
वे हमें तभी और उतनी ही देर के लिये लगते हैं अच्छे।

पवन करण

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